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हिंदी सीखते हुए तमिल भाषियों की कुछ भूलें

 

 


संविधान में उल्लेख, बड़ा सा राजभाषा विभाग और बड़े-बड़े सरकारी तामझाम के बावजूद हिंदी का वैसा प्रचार नहीं हुआ, जैसा उसकी उपयोगिता देखते-समझते हुए उसे सहज स्वीकारने से हुआ है| पिछली सदी के छठे दशक से ही दक्षिण में, विशेषकर तमिलनाडु में, हिंदी विराध के स्वर मुखर होने लगे थे परंतु इसके पीछे राजनीतिक कारण अधिक थे| आम जन यह समझ रहे थे कि राज्य की सीमाओं से बाहर देश से जुड़ने के लिए हिंदी सीखना उनके अपने व्यापक हित में है और वे औपचारिक-अनौपचारिक सभी माध्यमों से हिंदी सीखने को उत्सुक थे| राजभाषा का प्रचार-प्रसार सरकार की ज़िम्मेदारी भले ही रहा हो, संपर्क भाषा का विकास स्वतः होता रहा और हिंदी की आंचलिक शैलियाँ विकसित होती गईं| आज जिन रूपों को हम बम्बैइया हिंदी, हैदराबादी हिंदी या तमिल हिंदी कहते हैं वे संपर्क भाषा हिंदी के ही रूप हैं|

भाषाविज्ञान के क्षेत्र में आधिनिक अनुसंधानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य लगभग छह वर्ष की आयु तक अपनी मातृभाषा में दक्षता पा लेता है| उस भाषा के नियमों के सुदृढ़ संस्कार उसके मस्तिष्क में बैठ जाते हैं| इसके बाद वह जो भी भाषा सीखता है, उसके नियमों को पहले सीखी हुई भाषा के नियम प्रभावित करते हैं| नई सीखी जाने वाली भाषा पहली भाषा के जितने निकट बैठती है, उतनी ही सरलता से सीखी जा सकती है| जहाँ तक दक्षिण की भाषाओं का प्रश्न है, तमिल भाषी के लिए हिंदी सीखना अन्य की अपेक्षा कठिन है| मलयालम, तेलुगु, कन्नड़ में हिंदी की समान शब्दावली अधिक होने से और वर्ण और उच्चारण के नियमों की प्रायः समानता से इन भाषाओं को बोलने वाले तमिल मातृभाषियों की अपेक्षा हिंदी में भूलें कम करते हैं| किंतु तमिल के साथ स्थिति कुछ भिन्न है| आज उनकी कथित भूलों की चर्चा| “कथित” इसलिए कि इन भूलों का भी अपना व्याकरण है.

तमिल भाषी हिन्दी में जो भूलें करते हैं उन्हें मोटे तौर पर दो प्रकार की कह सकते हैं : रूप अर्थात वर्तनी संबंधी तथा रचना अर्थात अर्थ और प्रयोग संबंधी| वर्तनी की भूलों में सबसे अधिक महाप्राण व्यंजनों की है| तमिल में लिपि के स्तर पर और उच्चारण के स्तर पर भी महाप्राणत्व नहीं है| इसलिए महाप्राण को अल्पप्राण रूप में लिखा जाता है या अतिसतर्कता के कारण अल्पप्राण को भी महाप्राण कर दिया जाता है| 

  • आरम्ब में जगड़ा हो गया     (आरंभ में झगडा हो गया)

  • आँक दिकाओ              (आँख दिखाओ)

  • भिकारी को तोडा इदर बेजो  (भिखारी को थोड़ा इधर भेजो)

  • बारी बोज कैसे उटाऊँ       (भारी बोझ कैसे उठाऊँ)

  • खमरेमें खदम रक्का        (कमरे में कदम रखा)

  • दुखानदार ने काना काया क्या (दूकानदार ने खाना खाया क्या)

इसी प्रकार कभी अघोष के स्थान पर घोष और घोष के स्थान पर अघोष बोले –लिखे जाते हैं :

  • जूट मत बोलिए                 (झूठ मत बोलिए)

  • संदोष भड़ी चीज है               (संतोष बड़ी चीज़ है)

  • गांदी जी ने अपने हात से सूद कादा  (गांधी जी ने अपने हाथ से सूत काता)

  • नदी में जलांग लगाई             (नदी में छलांग लगाई)

तमिल में संस्कृत मूल के आगत शब्दों के कुछ संयुक्ताक्षरों में व्यंजन के साथ र् जुड़ने पर संयुक्त अक्षर के पहले इ आ जाता है| इसलिए तमिल में जो वर्तनी शुद्ध है वह हिंदी में अशुद्ध हो जाती है, जैसे :

  • पिरदम मन्तिरी    (प्रथम मंत्री)

  • पिरसव           (प्रसव)

  • चंदिरमा          (चंद्रमा)

  • तन्तिर-मन्तिर     (तंत्र-मंत्र)

हिंदी के अन्य अनेक शब्द तमिल में भिन्न वर्तनी से लिखे जाते हैं| तमिल भाषी उसी वर्तनी को हिंदी में ले आते हैं तो अनजाने भूल कर बैठते हैं| जैसे:

वक्कील (वकील), कच्चरा (कचरा), रोट्टी (रोटी), चप्पाती (चपाती), कम्मि (कमी), टाणा (थाना), चीट्टू (चिट), रयिल (रेल) आदि 

हिंदी के बारे में प्रायः कहा जाता है कि वह जैसी बोली जाती है, वैसी ही लिखी जाती है| यह बयान हिंदी सीखने वालों के लिए बड़ा भ्रामक सिद्ध होता है| जैसे हिंदी में पद के अंत या पद के बीच में भी अक्षर के अंत में अ का उच्चारण नहीं होता| तमिल में और अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी यह स्थिति नहीं है| शब्द की वर्तनी में अ यदि है, तो बोला अवश्य जाता है| स्वाभाविक है कि तमिलभाषी हिंदी में ऐसी भूलें करते हैं; जैसे:

दूस्रे (दूसरे), सुन्ता है (सुनता है), मिल्कर (मिलकर), सक्ता था (सकता था), हौस्ला (हौसला), बुन्कर (बुनकर) आदि|

तमिल और हिंदी की साझा शब्दावली के अनेक शब्द तमिल में भिन्न अर्थ में प्रयुक्त होते हैं| मातृभाषा तमिल के ऐसे किसी शब्द को जब तमिलभाषी हिंदी में ले आता है तो अनजाने अशुद्धि कर बैठता है| जैसे:

  • संभव (घटना) मैं इस संभव को नहीं भूलूंगा|

  • अवकाश (अवसर) आपके पास आने का अवकाश मिलना मेरा सौभाग्य है|

  • कल्याण (विवाह) सीता का कल्याण राम के साथ हुआ|

  • सामर्थ्य (चतुराई/सावधानी) दिल्ली जा रहे हो, सामर्थ्य से रहना|

  • आलोचना (परामर्श) मैं आपसे मिलकर आलोचना करूँगा|

हिंदी व्याकरण के कुछ नियम भी तमिलभाषियों की कठिनाइयां बढाते हैं| इनमे शायद सबसे विकट है लिंगनिर्धारण| हिंदी में लिंगनिर्धारण के नियम सुस्पष्ट नहीं हैं, परंपरा पर आधारित हैं और प्रायः प्रत्येक नियम या उपनियम का कोई अपवाद है| तमिल में ऐसा नहीं है| जैसे हिंदी में आकारांत और ईकारांत शब्द प्रायः स्त्रीलिंग हैं – इस तर्क पर तमिल में घोड़ा, नाला, पाला या पानी, घी, पक्षी का प्रयोग स्त्रीलिंग में हो जता है| इसी प्रकार तमिल में विशेषण का कोई लिंग-वचन नहीं होता| हिंदी में कुछ का नहीं होता, कुछ का होता है| वे विशेष्य के लिंग-वचन के अनुसार बदलते हैं| यहाँ तमिल भाषी को असुविधा होती है और वह “अच्छी लड़की” के स्थान पर अच्छा लड़की कह सकता है; क्योंकि तमिल में “नल्ल पैयन” (अच्छा लड़का) और “नल्ल पेण” (अच्छी लड़की) दोनों में विशेषण समान है| लिंगनिर्धारण की इसी भ्रामकता से सर्वनाम संबंध कारक में “उंगल वीडु” (आपका घर) के अनुसार वह “आपका पुस्तक” (उंगल पुत्तकम्) प्रयोग कर सकता है| 

कुछ इस प्रकार की भूलें भी व्याकरण नियमों की शिथिलता से होती हैं:

  • तमिल में कर्ताकारक में ‘ने’ परसर्ग न होने से जहाँ नहीं लगना था वहाँ लगा देते हैं या जहाँ नहीं लगना था वहाँ लगा दिया जाता है, जैसे – मैं पढ़ा (नान पडित्तेन), मैंने जा रहा हूँ  (नान पोगिरेन)

  • संबंध वाचक सर्वनाम न होने से- क्या हम कर सकते हैं, वह करें (यन्न पण्ण मुडियदु, अदु पण्ण वेंडियदु)

  • हिंदी के तमिल समानार्थी के अर्थ में क्षेत्र विस्तार से – केलु (पूछना/मांगना) भिखारी पैसा पूछता है; पोट्टू (डालना/ ऑन करना) पंखा डालो; पुरप्पडु (रवाना होना/शुरू होना) गाड़ी शुरू हो गई|

वस्तुतः हिंदी का एक पूर्ण मानक रूप तो हिंदी क्षेत्र में भी नहीं है| उच्चारण और वाक्य रचना के नियम क्षेत्रानुसार भिन्न हैं: कहीं “दही खाई जाती है” तो कहीं “खाया जाता है|” कहीं “मैंने” नहाना है शुद्ध है तो कहीं “मुझे” नहाना है| यही हाल वर्तनी का है| दुकान-दूकान, गर्मी-गरमी, दिवार-दीवाल/दीवार जैसे अनेक शब्द चिढाते हैं| ऐसे में हिंदी से भिन्न मातृभाषा भाषी की हिंदी पर नाक-भोंह सिकोड़ने के बजाए हमें उसका स्वागत करना चाहिए कि वह, जैसे भी हो, हिंदी बोल तो रहा है| इस आलेख का अभिप्राय छिद्रान्वेषण नहीं, वरन हिन्दी सीखने वाले तमिल भाषियों को उन संभावनाओं से परिचित कराना है जहाँ अशुद्धियाँ हो सकती हैं; और हिंदी भाषियों को यह बताना भी कि किसी की भूलों पर मुस्कराने से पहले वे समझ सकें कि भूलों के पीछे कोई कारण होता है|

हम उनकी भाषा सीखकर उसे समझ सकते हैं|

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