सांसारिक मोह-माया का, कर्तव्यों और आग्रहों का पूर्ण परित्याग करके स्वयं को ईश्वर या उच्च उद्देश्य के प्रति समर्पित करने की स्थिति को इन तीन शब्दों में से क्या कहा जाए, यह प्रश्न है। (फोटो साभार X, पूर्व ट्विटर से) संलग्न चित्र में विशेषज्ञ वक्ता का निर्णय स्पष्ट है। कार्यक्रम का नाम "ज़िद" (हठ) सर्वथा उपयुक्त है। इस बात का हठ कि जो हम कहें वही ठीक। भाषा के अपने नियम होते हैं, वहाँ ज़िद नहीं चलती। "संन्यास" ठीक है, और "सन्न्यास" भी। हिंदी में संन्यास अधिक प्रचलित है। कैसे? आइए, जानें। संस्कृत व्याकरण में एक सूत्र है "मोऽनुस्वारः", यह म् के बाद व्यंजन होने पर म् को अनुस्वार करता है । इस सूत्र से सम्+न्यास को 'संन्यास' हुआ। अब सं+न्यास को "अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः" (अनुस्वार को वर्गीय व्यञ्जन परे होने पर परसवर्ण अर्थात बाद वाले वर्ण का पंचमाक्षर) सूत्र से परसवर्ण हुआ तो सन्न्यास हुआ। अब "वा पदान्तस्य" (पदान्त के अनुस्वार को वर्गीय व्यञ्जन परे होने पर विकल्प से परसवर्ण होता है)। इस सूत्र से परसवर्ण विकल्प से हो...
मनोहर श्याम जोशी के दो प्रसिद्ध उपन्यास हैं – 'क्याप' और 'कसप'। दोनों उपन्यासों की हिंदी को 'कुमाउँनी हिंदी' कहा जा सकता है क्योंकि उपन्यासों में अनेक कुमाउँनी शब्दों का प्रयोग हुआ है और वाक्य रचना की शैली भी कुमाउँनी से अत्प्रयधिक भावित है। दोनों उपन्यासों के नाम अपने आप में रहस्य हैं और पाठक को उनका अर्थ धीरे-धीरे स्पष्ट होता है। आइए, दोनों पर क्रमशः संक्षेप में विचार करें। क्याप "आप कहेंगे कि यह कथा तो क्याप-जैसी हुई ! धैर्य-धन्य पाठको, यही तो रोना है।" ~मनोहर श्याम जोशी क्याप दो घटकों से निर्मित होता है– /क्या/ सर्वनाम (यहाँ अनिश्चयवाचक) और निपात /प/। क्याप का हिंदी में कोई समानार्थी शब्द नहीं, और कुमाईं में इसकी अनेक अर्थ छबियाँ हैं! उन्हें कुमाउँनी के संदर्भ में समझना ही उपयोगी होगा। कुछ प्रयोग किस प्रकार हैं – * क्याप भै = अजीब, अनगढ़, निराशाजनक, बेकार * क्याप है गो != जाने क्या हो गया * क्याप छु हात में = कुछ अनजाना है... *भोव क्याप हो = भविष्य अनिश्चित है * हमरि क्याप = हमारी बला से * क्याप चितुणयूँ = अजीब-सी बेचैनी * क्याप है पड़...