भाषाविज्ञान में, अतिशोधन (हाइपरकरेक्शन) एक ऐसी त्रुटि है, जिससे कोई वक्ता या लेखक, किसी रूप को सही या अधिक प्रतिष्ठित भाषा के रूप में समझते हैं और उसे प्रतिस्थापित करते हैं। कथित शुद्ध रूप का उपयोग करने के प्रयास में, किसी नियम को अधिक होशियारी से किंतु गलत तरीके से लागू करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक गलत रूप चल पड़ता है । भाषिक अतिशोधन के दो प्रमुख कारण हैं– अति सतर्कता और उस नियम विशेष का अज्ञान। अर्थात् एक वास्तविक या काल्पनिक वैयाकरणिक नियम को अनुपयुक्त संदर्भ में लागू किया जाता है, जिससे "सही" करने के प्रयास में गलत परिणाम सामने आते हैं। अतिशोधन के उदाहरण सभी भाषाओं में मिल सकते हैं, हिंदी में भी। शुभेच्छा के लिए 'शुभेक्षा', छात्र जीवन के लिए क्षात्र जीवन, क्योंकि अज्ञान-जन्य भ्रम से /क्ष/ और /छ/ को अभिन्न या परस्पर स्थानापन्न मान लिया जाता है। एक उदाहरण वैष्णोदेवी के यात्रा मार्ग में कटरा और भवन के बीच स्थित एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पड़ाव मिलता है, जो कभी-कभी समाचारों में भी दिखाई पड़ जाता है। नाम कुछ पुराना है– अधकुँवारी। किसी से भी उसका अर्थ पूछिए तो...
पुराने समय में कुमाउँनी भाषा में सिक्कों के लिए दो-तीन अलग-अलग शब्द व्यवहार में थे: ढेपुव, टाक और डबल/डबव। एक पैसे के लिए 'डबल/डबव' और आधे पैसे के मूल्य वाले सिक्के के लिए 'ढेपुवा'। यह शब्द कंपनी राज का पैसा आने से पहले ही चलन में था। इसकी उत्पत्ति संस्कृत भाषा के ढेव्वुका (सिक्का, पैसा) से है। पहले एक पैसे के लिए प्रयुक्त डबल शब्द आज भी प्रचलित है। अर्थ विस्तार से अब यह एक पैसा ही नहीं, सामान्य मुद्रा या धन के लिए उपयोग में लाया जाता है। संयोग से तेलुगु भाषा का शब्द 'डब्बू', 'डब्बुलू' (सिक्का, धन) संस्कृत के 'ढेव्वुका' सिक्का से संबंधित है, और इस प्रकार यह हिंदी के 'ढबुआ' (एक प्राचीन तांबे का सिक्का) से भी जुड़ा हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि कुमाऊँ में भी डबल और ढेपू दोनों प्रचलित है और दोनों का मूल संस्कृत 'ढेव्वुका' माना जा सकता है। 'डबव' आज भी मुहावरों में इस्तेमाल होता है, जैसे: "मैं थें एक डबव न्हें" (मेरे पास एक भी पैसा नहीं है)। कहा जाता है कि 18-वीं सदी में, अंग्रेजी भाषा ने तेलुगु से 'डब' (मूल...