नागरिकदेवो भव तैत्तिरीय उपनिषद, शिक्षावल्ली में एक महत्वपूर्ण कथन है— "मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव॥" भारतीय संस्कृति की उदात्त भावनाओं को दर्शाने वाले प्रतिनिधि कथन मानकर इन सूक्तियों का उपयोग विविध क्षेत्रों में आदर्श वाक्य के रूप में किया जाता है। इसी क्रम में और इन्हीं के अनुकरण पर एक नई अभिव्यक्ति भारतीय इतिहास में जुड़ी है– "नागरिकदेवो भव", जो प्रधानमंत्री कार्यालय के नवनिर्मित भवन पर एक आदर्श वाक्य के रूप में लिखी गई है। कुछ सजग-सतर्क भाषा प्रेमी इस कथन की वर्तनी की शुद्धता-अशुद्धता पर विचार कर रहे हैं और इसे अशुद्ध ठहरा रहे हैं। असल में हम जाने कब से "अतिथि देवो भव", "मातृ देवो भव" आदि पढ़ने-लिखने के अभ्यस्त हो गए हैं, जो कि हिंदी में ठीक हैं किंतु संस्कृत व्याकरण के अनुसार अशुद्ध हैं। इसलिए हमें लगता है कि नागरिकदेवो भव अशुद्ध है और शुद्ध होना चाहिए– "नागरिक देवो भव"! मातृदेव, पितृदेव, या नागरिकदेव पद बहुव्रीहि समास माने गए हैं, इसलिए इनका अर्थ है– मातृदेव: (माँ ही जिसकी देवता है ऐसा भव (...
व्युत्पत्ति न सही, उत्पत्ति ही सही! (प्रख्यात भाषा वैज्ञानिक सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय का एक रोचक संस्मरण; सौजन्य डॉ मधु कपूर) •••••• ऐसा हुआ है कभी कि खाना अटक जाए? फरवरी 1975 की बात है। विख्यात बंगला लेखक नारायण सान्याल की बड़ी बेटी की शादी थी। मेहमानों के भोजन की ज़िम्मेदारी कैटरर को दी गई थी। निमंत्रितों की सूची में अनेक गण्यमान्य व्यक्ति थे, जिनमें भाषाविद् सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय भी शामिल थे। अचानक खबर आई कि भाषाविद् सुनीति बाबू जल्दी आ गए हैं क्योंकि उन्हें तुरंत एक सेमिनार के लिए जाना है। उन्हें घर में बिठाकर नारायण सान्याल छत पर बिजली ग्रिल (कैटरर) के मैनेजर के पास दौड़े। "मेरे एक बहुत विशिष्ट अतिथि आ गए हैं। आप उनके लिए मुख्य व्यंजनों में से कुछ एक थाली में सजा दीजिए।" थोड़ी देर बाद मैनेजर स्वयं एक थाली में खाना सजाकर ले आए। खाते-खाते अचानक सुनीति बाबू ने एक व्यंजन की ओर इशारा करते हुए पूछा, "यह क्या है?" मैनेजर ने हँसकर कहा, "यह फिश और्ली है सर, खाइए, वेटकी मछली का स्पेशल व्यंजन है।" "फिश का क्या?" "जी, और्ली।...