पुराने समय में कुमाउँनी भाषा में सिक्कों के लिए दो-तीन अलग-अलग शब्द व्यवहार में थे: ढेपुव, टाक और डबल/डबव। एक पैसे के लिए 'डबल/डबव' और आधे पैसे के मूल्य वाले सिक्के के लिए 'ढेपुवा'। यह शब्द कंपनी राज का पैसा आने से पहले ही चलन में था। इसकी उत्पत्ति संस्कृत भाषा के ढेव्वुका (सिक्का, पैसा) से है। पहले एक पैसे के लिए प्रयुक्त डबल शब्द आज भी प्रचलित है। अर्थ विस्तार से अब यह एक पैसा ही नहीं, सामान्य मुद्रा या धन के लिए उपयोग में लाया जाता है। संयोग से तेलुगु भाषा का शब्द 'डब्बू', 'डब्बुलू' (सिक्का, धन) संस्कृत के 'ढेव्वुका' सिक्का से संबंधित है, और इस प्रकार यह हिंदी के 'ढबुआ' (एक प्राचीन तांबे का सिक्का) से भी जुड़ा हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि कुमाऊँ में भी डबल और ढेपू दोनों प्रचलित है और दोनों का मूल संस्कृत 'ढेव्वुका' माना जा सकता है। 'डबव' आज भी मुहावरों में इस्तेमाल होता है, जैसे: "मैं थें एक डबव न्हें" (मेरे पास एक भी पैसा नहीं है)। कहा जाता है कि 18-वीं सदी में, अंग्रेजी भाषा ने तेलुगु से 'डब' (मूल...
मस और मूँछ दोनों का मूल एक है– संस्कृत में श्मश्रु, प्राकृत में मस्सू। किशोरावस्था में लड़कों में कुछ शारीरिक परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं। इनमें एक है नाक के नीचे ऊपरी होंठ पर उगती रोमावली - मसें। मसें भीगना एक मुहावरा है। लड़कों के जब मूँछों वाली पहली रोमावली आती है तो उसे मस कहते हैं। मसें भीगना मुहावरा है, अर्थ है युवावस्था की दहलीज़ पर होना। एक ओर श्मश्रु के प्राकृत रूप मस्सु से मस बना है, तो दूसरी ओर श्मश्रु से > मच्छु > मुच्छ > मूँछ। ♦️ इरफान साहब ने कभी X- मोहल्ले में पूछा था — "बाछें कहाँ हैं और वे कैसे खिलती होंगीं?" नाचीज़ ने कुछ यूँ अर्ज़ किया था: बाँछें हम सबके होती हैं। हमारे मुँह के दोनों सिरे (कोरें), जहाँ दोनों होंठ मिलते हैं, उन्हें बाँछें कहा जाता है। जब हम भीतर से प्रसन्न होते हैं तो वह प्रसन्नता मुस्कान के साथ बाँछों में व्यक्त होती है, और बाँछें खिलती हैं। हर मर्ज़ की दवा और हर शब्द की जड़ संस्कृत में ढूँढ़ने वाले कुछ लोग इसका मूल वांछा (इच्छा) से मानते हैं। 'हिंदी शब्द सागर' भी बाँछ को देशज शब्द मानता है और अर्थ देता है होठों की कोर! [नख...