‘मैं आपके घर आ रखा हूँ, आप कहाँ जा रखे हैं?' हम दिनभर में न जाने कितने ऐसे वाक्य बोलते हैं, जो हमारे कानों को बिल्कुल सहज लगते हैं। दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अब उत्तराखंड में भी ऐसे वाक्य अक्सर सुनाई देते हैं—“हाँ भाई, मैं स्टेशन पर आ रखा हूँ” या “वह तो कब का जयपुर जा रखा है।” बोलने वाले को अपनी बात एकदम साफ़ लगती है और सुनने वाला भी समझ जाता है कि अगला पहुँच चुका है। लेकिन ज़रा ठहरकर सोचिए—क्या हिंदी का व्याकरण भी इस बात को उतनी ही आसानी से हजम कर लेता है? जवाब है—नहीं। ‘आ रखा हूँ’ और ‘जा रखा हूँ’ में अनजाने ही दो अलग-अलग क्रियाओं का ऐसा घाल-मेल हो गया है, जिसे मानक हिंदी का व्याकरण सहज नहीं मानता। ‘रखना’ मूलतः सकर्मक क्रिया है—किसी वस्तु को कहीं रखा जाता है: “मैंने किताब मेज पर रख दी है।” इसके विपरीत ‘आना’ और ‘जाना’ अकर्मक क्रियाएँ हैं—इन्हें किसी कर्म की आवश्यकता नहीं होती। यहीं से गड़बड़ शुरू होती है। ‘रखना’ जब सहायक या रंजक क्रिया के रूप में आता है, तो सामान्यतः सकर्मक क्रियाओं के साथ जुड़ता है—“मैंने पत्र लिख रखा है”, “पैसे बचा रखे हैं।” लेकिन ‘आना’ और ‘...
भूरि-भूरि प्रशंसा या भूरी-भूरी प्रशंसा? साधो! किसी की भूरि-भूरि प्रशंसा कीजिए—बस ध्यान रहे कि प्रशंसा करते-करते कहीं उसे भूरी-भूरी न कर बैठें! ‘भूरि’ संस्कृत का बड़ा ही काम का शब्द है—अर्थ है बहुत अधिक, प्रचुर, विपुल। इसलिए ‘भूरि-भूरि प्रशंसा’ का सीधा-सादा अर्थ है—बहुत अधिक प्रशंसा। वैदिक संस्कृत से लेकर हिंदी के श्रेष्ठ साहित्य तक भूरि का भूरि-भूरि प्रयोग मिलता है। अब ज़रा आधुनिक भाषा का कमाल देखिए। बोलने में सुविधा, यानी मुख-सुख और प्रयत्नलाघव के फेर में छोटी ‘इ’ को थोड़ा खींच दिया गया और वह बड़ी ‘ई’ बन गई। बस, फिर क्या था—‘भूरि’ की मात्रा बदलते ही उसका अर्थ भी बदल गया। विपुल प्रशंसा पहुँच गई रंगशाला में और बन गई ‘भूरी-भूरी’! प्रशंसा तो एक भाव है और भाव का कोई रूप-रंग नहीं होता। भाषाविज्ञान की भाषा में यह श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्दों के अनजाने और दोषपूर्ण प्रयोग का एक रोचक उदाहरण है। कहने वाला करना चाहता है—‘आपकी ढेर सारी प्रशंसा’, मगर एक मात्रा की फिसलन से ऐसा लगता है मानो वह कह रहा हो—‘आपकी प्रशंसा का रंग भूरा है!’ यानी एक छोटी-सी मात्रा ने अर्थ का पूरा मेकओवर कर दिया—‘प्रचुर’ से...