मनोहर श्याम जोशी के दो प्रसिद्ध उपन्यास हैं – 'क्याप' और 'कसप'। दोनों उपन्यासों की हिंदी को 'कुमाउँनी हिंदी' कहा जा सकता है क्योंकि उपन्यासों में अनेक कुमाउँनी शब्दों का प्रयोग हुआ है और वाक्य रचना की शैली भी कुमाउँनी से अत्प्रयधिक भावित है। दोनों उपन्यासों के नाम अपने आप में रहस्य हैं और पाठक को उनका अर्थ धीरे-धीरे स्पष्ट होता है। आइए, दोनों पर क्रमशः संक्षेप में विचार करें। क्याप "आप कहेंगे कि यह कथा तो क्याप-जैसी हुई ! धैर्य-धन्य पाठको, यही तो रोना है।" ~मनोहर श्याम जोशी क्याप दो घटकों से निर्मित होता है– /क्या/ सर्वनाम (यहाँ अनिश्चयवाचक) और निपात /प/। क्याप का हिंदी में कोई समानार्थी शब्द नहीं, और कुमाईं में इसकी अनेक अर्थ छबियाँ हैं! उन्हें कुमाउँनी के संदर्भ में समझना ही उपयोगी होगा। कुछ प्रयोग किस प्रकार हैं – * क्याप भै = अजीब, अनगढ़, निराशाजनक, बेकार * क्याप है गो != जाने क्या हो गया * क्याप छु हात में = कुछ अनजाना है... *भोव क्याप हो = भविष्य अनिश्चित है * हमरि क्याप = हमारी बला से * क्याप चितुणयूँ = अजीब-सी बेचैनी * क्याप है पड़...
बराबरी की हास्यास्पद पहल हिंदी के साथ आपराधिक छेड़छाड़ करने में नवभारत टाइम्स नाम का यह प्रमुख राष्ट्रीय पत्र सबसे आगे रहा है। इन्हें कोई बताए कि हिंदी में पदवाची नाम लिंग निरपेक्ष होते हैं। किसी भी भाषा का एक सतत प्रवाह होता है। वह अचानक उत्पन्न नहीं होती। उसका इतिहास होता है और भविष्य भी। यह बात और है कि भाषा का भविष्य उसे वर्तमान में बरतने वालों के हाथ में होता है। वे चाहें तो अपनी भाषा का बेड़ा ग़र्क भी कर सकते हैं और चाहे तो उसे डूबने से बचा भी सकते हैं। "दुनिया में पहली बार बराबरी की भाषा" का आविष्कार करने का दावा करने वाले नभाटा के इन भाषा विशेषज्ञों से पूछा जाए कि प्रत्येक संज्ञा और विशेषण शब्द का स्त्री लिंग बनाने की पहल करने की भाषिक आवश्यकता क्या है? कौन यह परामर्श दे रहा है और यह सत्प्रयत्न स्वयं हिंदी भाषा के प्रति और उसके वरतने वालों के प्रति कितना न्याय संगत है। बल्लेबाज का स्त्रीलिंग 'बल्लेबाजनी', वैज्ञानिक का 'वैज्ञानिका' और सबसे हास्यास्पद प्रयास विधायक के लिए 'विधायिका'! जबकि विधायिका हिंदी में लेजिस्लेचर के लिए स्वीकृत और बहुप्र...