कुमाउँनी "पैर पड़ण" का अर्थ पैरों पर गिरना नहीं है। भूस्खलन के लिए प्रचलित शब्द पहिरो/पइरो/पैरो (नेपाली), पैर/पैरो (कुमाउँनी) की व्युत्पत्ति संस्कृत "प्रसरः" (बढ़ना , विनाश, बाढ़) से संभव लगती है। आप्टे के अनुसार प्रसर का अर्थ भीषण तूफ़ान, तेज वर्षा, नदी का तीव्र वेग, बाढ़, विनाश आदि भी है। किंतु राल्फ़ टर्नर की व्युत्पत्ति अधिक तर्कसंगत है। उसके अनुसार पैरो (pa’irō), पैर (pa’ir) (कुमाउँनी); पऽइरो pa’irō, पहिरो pahirō (नेपाली) एक ही मूल के हैं। ~धेरै पानी परे पछि पऽइरो पऱ्यो। ~खूब पाणि पड़ीं पछिल पैरो पड़्यो। {हिम पहिरो (नेपाली.), ह्यूँ पैरो (कुमाउँनी) अर्थात् avalanche (हिमस्खलन)} टर्नर के अनुसार: कुमाउँनी/नेपाली पैरो pairo (landslip); -- perh. < संस्कृत pradaráḥ प्रदर (प्र+दर) fissure (गर्त) से व्युत्पन्न है। आप्टे ने 'प्रदर' का अर्थ फटना, दरार, छिद्र, गड्ढा, गर्त, विवर आदि माना है। जैसे वाल्मीकि रामायण में: "इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः प्रदरः खन्यतामिति। तस्थौ विराधमाक्रम्य कण्ठे पादेन वीर्यवान्।।" वाल्मीकि रामायण, (3.4....
नागरिकदेवो भव तैत्तिरीय उपनिषद, शिक्षावल्ली में एक महत्वपूर्ण कथन है— "मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव॥" भारतीय संस्कृति की उदात्त भावनाओं को दर्शाने वाले प्रतिनिधि कथन मानकर इन सूक्तियों का उपयोग विविध क्षेत्रों में आदर्श वाक्य के रूप में किया जाता है। इसी क्रम में और इन्हीं के अनुकरण पर एक नई अभिव्यक्ति भारतीय इतिहास में जुड़ी है– "नागरिकदेवो भव", जो प्रधानमंत्री कार्यालय के नवनिर्मित भवन पर एक आदर्श वाक्य के रूप में लिखी गई है। कुछ सजग-सतर्क भाषा प्रेमी इस कथन की वर्तनी की शुद्धता-अशुद्धता पर विचार कर रहे हैं और इसे अशुद्ध ठहरा रहे हैं। असल में हम जाने कब से "अतिथि देवो भव", "मातृ देवो भव" आदि पढ़ने-लिखने के अभ्यस्त हो गए हैं, जो कि हिंदी में ठीक हैं किंतु संस्कृत व्याकरण के अनुसार अशुद्ध हैं। इसलिए हमें लगता है कि नागरिकदेवो भव अशुद्ध है और शुद्ध होना चाहिए– "नागरिक देवो भव"! मातृदेव, पितृदेव, या नागरिकदेव पद बहुव्रीहि समास माने गए हैं, इसलिए इनका अर्थ है– मातृदेव: (माँ ही जिसकी देवता है ऐसा भव (...