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अदा करना , अता करना

नमाज़ अदा की जाती है, अता नहीं (Photo courtesy: wiki commons) अदा – अरबी से आया हुआ शब्द है। इस्लामी धर्मशास्त्र के अनुसार अदा करना का अर्थ है निश्चित समय पर पूजा-अर्चना करना, वह प्रार्थना जो निश्चित समय पर की जाए। ऋण इत्यादि का भुगतान भी अदा करना कहलाता है।  इसके अतिरिक्त किसी निबंध या विचार इत्यादि का व्याख्यान अथवा अभिव्यक्ति की शैली को भी अदा कहते हैं। आँख का संकेत, प्रेमियों के समान रंग-ढंग, नाज़-नखरे भी अदा के अंतर्गत आते हैं। अता – यह भी अरबी शब्द है, अर्थ है बड़ों की ओर से छोटों को मिलने वाला दान, इनाम, पुरस्कार, बख्शीश देना;जैसे अल्लाह की अता‌एँ। वो जिस ने आँख अता की है देखने के लिए उसी को छोड़ के सब कुछ दिखाई देता है। (~ज़ुबैर अली ताबिश) ♦️
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कांजी हाउस कथा…

काँजी हाउस सुने हैं कभी? खेती को हानि पहुँचाने वाले, अनारक्षित, आवारा मवेशियों (गाय, बैल, गधे, बकरियाँ आदि) को पकड़ कर रखने और बाद में उनके स्वामियों से दंड वसूल करने के लिए नगर पालिकाओं, पंचायतों आदि के द्वारा कुछ पशुबाड़े बनाए जाते हैं जिन्हें काँजी हाउस कहा जाता है। सरकार अथवा सरकार द्वारा सहायता प्राप्त निजी संस्थाओं के द्वारा काँजी हाउसों की व्यवस्था की जाती है। इन्हें बोलचाल में काजी हौस भी कहा जाता है लेकिन इनका किन्हीं 'काज़ी' साहब से कोई संबंध नहीं है। काँजी हाउस शब्द की उत्पत्ति और अर्थ विस्तार की कथा बड़ी रोचक है। उधर दक्षिण का एक लोकप्रिय घरेलू पेय पदार्थ है- कंजी, जो भात को कुछ घंटों के लिए रात भर पानी में भिगोकर बनाया जाता है और बहुत पौष्टिक होता है। अंग्रेज बहादुर के राजकाज के शुरुआती दिनों में, (अंग्रेजों का शुरुआती प्रमुख केंद्र मद्रास था) सेना के भारतीय सैनिक जब कच्ची शराब पी लेते (पक्की तो उन्हें नसीब हो नहीं सकती थी) और उसके नशे में उद्दंडता या दुर्व्यवहार करते हुए पकड़े जाते तो उन्हें कुछ दिन के लिए बाकी सैनिकों से अलग बने हुए किसी घर में भेज दिया दिया जा...

दालचीनी के बहाने...

दालचीनी दालचीनी भी बड़ा अजीब शब्द है। इसमें न तो दाल है, न चीनी। थोड़ी सी मिठास है, जो तीखेपन से दब जाती है। और दाल? दाल तो न अरहर, न मूँग-मसूर; न साबुत, न धुली‌। मिलती है पेड़ की छाल से। दरअसल दालचीनी शब्द अरबी से शाही तोहफ़े के रूप में भारत आया । दालचीनी पैदा होती थी इंडोनेशिया में। वहाँ से चीन, और चीन से रेशमी मार्ग से होकर सार्थवाहों के साथ पहुँची अरब। अरब वालों ने देखा कि यह तो चीन से आई हुई मसाले वाली दार (लकड़ी) है, तो नाम हो गया दार-उल-चीनी (चीन क लकड़ी! और भारत में दालचीनी बनकर हमारी रसोई को सुगंधित कर रही है। हम में से जो अरबी-फ़ारसी से परहेज़ करते हैं वे भी दालचीनी के बिना नहीं रह सकते। संस्कृत में दालचीनी को उसके स्वाद के आधार पर ही नाम दिया गया। संस्कृत में दालचीनी को दारुसिता (सिता= चीनी) अर्थात चीनी जैसी मीठी लकड़ी, त्वक् (त्वचा, छाल), गुडत्वक् (गुड़ जैसी मीठी छाल) कहा जाता है। आयुर्वेद में दालचीनी को अनेक रोगों में लाभदायक बताया गया है। ♦️

खाना, बुकाना और बुकनी

संस्कृत √वृक्ण - व्रश्च् (छेदे– कुतरना) + क्त (भूत.कृदंत) कटा हुआ, बाँटा हुआ, फाड़ा हुआ, कतरा हुआ। वृक्ण से हिंदी में बुकना, बुकनी, बुकाना। कुमाउँनी में बुकूण (बुकाना) क्रिया है। कच्चे चावल (खाजा), खजिया, शिरोल, चिवड़ा बुकाए जाते हैं, अर्थात मुँह में रखकर धीरे-धीरे दाँतों से पीसकर चूरा बनाते हुए खाए जाते हैं। नेपाली, मैथिली में भी बुकना, बुकाना हैं। बुकनू, बुकनी चूर्ण (पाउडर ) के लिए हैं। नमक की बुकनी, मिर्च-मसालों की बुकनी, अबीर-गुलाल की बुकनी आदि प्रयोग सुनाई पड़ते हैं। एक प्रसिद्ध चाय कंपनी "बुकनी चाय" के नाम से डस्ट टी बेचा करती थी।  बुकनू एक बहु उपयोगी चूर्ण उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विविध व्यंजनों में मिलाकर बड़े चाव से खाया जाता है। कनपुरिया बुकनू, बुंदेलखंडी बुकनू, कनौजिया बुकनू आदि अनेक सुप्रसिद्ध प्रभेद सुनाई पड़ते हैं। ♦️ भोजन करने के लिए खाना क्रिया यद्यपि पूरे उत्तर भारत में है, कुमाऊँ में इसके लिए कुछ विशेष क्रियाएँ और भी हैं; जैसे भसकूण (भस्काना), बुकूण (बुकाना), कोचीण (कूँचना), धपोड़ण (धपड़ना), सपोड़ण (सपोड़ना, चट कर जाना)। भसकूण (भसकना) संस्कृत भक्षण स...

खी-खी के बहाने …!

खी-खी के बहाने हाहा-हूहू, ही-ही या खी-खी के बहाने किसी की खिल्ली उड़ाना ठीक नहीं। हिंदी में ये सभी विस्मय, आनंद, आमोद आदि मनोभावों को बताने वाले अव्यय हैं। इनका व्यावहारिक प्रयोग और उचित संदर्भ समझ लेना ज़रूरी है।   अमरकोश के अनुसार "हाहा हूहू" गंधर्वों को कहा जाता है जो देवयोनि में माने जाते हैं। वे अपने क्रियाकलापों से देवताओं को प्रसन्न रखते हैं। "हाहा हूहूश्चैवमाद्या गन्धर्वास्त्रिदिवौकसाम्।" ~अमरकोश 'हा-हा' पीड़ा, शोक या आश्चर्य का प्रकट करने वाला उद्गार है। हिंदी शब्दकोशों के अनुसार हाहा-हूहू ऊधम बाज़ी, हो-हल्ला, शोरगुल को व्यक्त करता है। हा-हा उन्मुक्त अट्टहास के लिए भी है तथा शोक और कष्ट व्यक्त करने के लिए भी। 'ही-ही' भी अव्यय है। आप्टे के अनुसार ही+ही आश्चर्य और प्रमोद को प्रकट करने वाला अव्यय है। रही बात खी-खी की। यह अनुकरणात्मक शब्द है जो हँसने की विशेष रूप से अप्रिय और चुभने वाली आवाज़ का संकेत करता है। 'खि' और 'खी' से अर्थ संकेत में बड़ा अंतर आया है। जैसे खिलखिलाना, खिलखिलाहट (कुमाउँनी में खितखिताट) में त्वरित और उन्मु...

शब्द चर्चा: साध्वी

साध्वी चर्चा   आजकल धार्मिक चोले के साथ राजनीति करने वाली अनेक स्त्रियाँ अपने नाम के आगे 'साध्वी' विशेषण जोड़ती हैं। X (पूर्व ट्विटर) पर एक अनुसारक ने पूछा– क्या साध्वी शब्द का संबंध सधवा, विधवा से है? क्या इन शब्दों का मूल एक है? समाधान में कहना पड़ा– नहीं, ऐसा नहीं है। संस्कृत में 'धव' का अर्थ है पति। विधवा का अर्थ हुआ जिसका 'धव' न हो अर्थात जो पति से रहित हो गई है; और विधवा का विलोम शब्द 'सधवा' अर्थात पति सहित नारी, जिसे सौभाग्यवती भी कहा जाता है।  साध्वी साधु से बना स्त्रीलिंग (साधु+ ई) सर्वथा भिन्न शब्द है। अमरकोश के अनुसार 'साध्वी' पतिव्रता को कहा जाता है।  पतिव्रता की व्याख्या अनेक पुराणों, स्मृतियों और कोश ग्रंथों में भिन्न-भिन्न प्रकार से की गई है। आज की भाषा में कहें तो सब परिभाषाओं के पीछे पुरुषवादी दृष्टिकोण है; जैसे हारीत स्मृति की यह परिभाषा देखिए— "आर्त्तार्त्ते मुदिता हृष्टे प्रोषिता मलिना कृशा। मृते म्रियेत या पत्यौ साध्वी ज्ञेया पतिव्रता॥" अर्थात जो स्त्री पति के दुखी होने पर दुखी, सुखी होने पर प्रसन्न, पति के परदेस जा...

योगक्षेम और जोखिम

॥योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ खतरा, risk के लिए हिंदी और बहुत सी भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्द जोखम/जोखिम संस्कृत "योगक्षेम" से व्युत्पन्न है।¹ योगक्षेम > जोगखेम > जोखम > जोखिम। योगक्षेम का कोशीय अभिप्राय कल्याण, भलाई, मंगल इत्यादि है। सदियों की यात्रा के बाद जोखम तक पहुँचते-पहुँचते इसके अर्थ में परिवर्तन आ गया है। किंतु अतर्क भी तर्क का ही एक पहलू है, जोखिम में भी योगक्षेम अर्थात सुरक्षा की संभावना को ही तोला जाता है। इस प्रकार इसमें तर्कसंगति का पूर्ण अभाव नहीं कहा जा सकता।  जोखिम/जोखिम का अर्थ है ऐसा काम जिसके लिए बहुत अधिक धन-शक्ति तथा साहस की अपेक्षा हो, फिर भी जिसकी सिद्धि अनिश्चित हो। किसी कार्य या व्यापार में घाटे, अनिष्ट या हानि की संभावना जोखिम है।  भारतीय जीवन बीमा निगम का ध्येय वाक्य है– "योगक्षेमं वहाम्यहम्"  अर्थात आपका कल्याण हमारी जिम्मेदारी है। यह श्लोक भगवद्गीता का है जिसमें भगवान कृष्ण अर्जुन को कहते हैं जो लोग निरंतर मुझ में निवेश करते हैं, मैं उनकी सुरक्षा की गारंटी देता हूँ। राजस्थान में व्यापारियों के सामान के बीमा कार्य के लिए भी कहीं-कहीं...