बराबरी की हास्यास्पद पहल हिंदी के साथ आपराधिक छेड़छाड़ करने में नवभारत टाइम्स नाम का यह प्रमुख राष्ट्रीय पत्र सबसे आगे रहा है। इन्हें कोई बताए कि हिंदी में पदवाची नाम लिंग निरपेक्ष होते हैं। किसी भी भाषा का एक सतत प्रवाह होता है। वह अचानक उत्पन्न नहीं होती। उसका इतिहास होता है और भविष्य भी। यह बात और है कि भाषा का भविष्य उसे वर्तमान में बरतने वालों के हाथ में होता है। वे चाहें तो अपनी भाषा का बेड़ा ग़र्क भी कर सकते हैं और चाहे तो उसे डूबने से बचा भी सकते हैं। "दुनिया में पहली बार बराबरी की भाषा" का आविष्कार करने का दावा करने वाले नभाटा के इन भाषा विशेषज्ञों से पूछा जाए कि प्रत्येक संज्ञा और विशेषण शब्द का स्त्री लिंग बनाने की पहल करने की भाषिक आवश्यकता क्या है? कौन यह परामर्श दे रहा है और यह सत्प्रयत्न स्वयं हिंदी भाषा के प्रति और उसके वरतने वालों के प्रति कितना न्याय संगत है। बल्लेबाज का स्त्रीलिंग 'बल्लेबाजनी', वैज्ञानिक का 'वैज्ञानिका' और सबसे हास्यास्पद प्रयास विधायक के लिए 'विधायिका'! जबकि विधायिका हिंदी में लेजिस्लेचर के लिए स्वीकृत और बहुप्र...
अनड्वान कुमाऊँ में अर्थ की दृष्टि से निगरगंड वर्ग का ही एक अन्य शब्द प्रचलित है– अनड्वान्। यह हिंदी में कम प्रचलित है, यद्यपि कुछ शब्दकोशों नेे इसका या इसकेे मूल प्रातिपदिक अनडुह् का उल्लेख किया है। अनड्वान शब्द की यात्रा बड़ी रोचक है। इसकी उत्पत्ति अनडुह् शब्द से है और जिसका शाब्दिक अर्थ है– अन (रथ, गाड़ी) को हाँकने वाला अनडुह्। 'अनडुह्' प्रातिपदिक का प्रथमा, एकवचन– अनड्वान् । इस प्रकार अनड्वान का पहला ही अर्थ हो गया बैल, और लक्षणा से गृहस्थी के रथ को हाँकने वाला अर्थात् परिवार का मुखिया। काल के रथ को निरंतर चलाने वाला हमारे सौर जगत का वह सबसे बड़ा और ज्वलंत तारा जिससे सब ग्रहों को ऊष्मा और प्रकाश मिलते हैं, अर्थात् सूर्य को भी अनड्वान कहा जाता है। बृहस्पति का भी एक नाम अनड्वान है। वेदों में अनड्वान् के अनेक उल्लेख हैं । अनड्वान् अनेक मंत्रों के दृष्टा ऋषि हैं। अथर्ववेद में एक पूरे सूक्त को अनड्वान सूक्त कहा जाता है। "अनड्वानिन्द्रः स पशुभ्यो वि चष्टे त्रयां छक्रो वि मिमीते अध्वनः। भूतं भविष्यद्भुवना दुहानः सर्वा देवानां चरति व्रतानि ॥" (अथर्ववेद– 4.11.2) यह म...