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दुहाई है

दुहाई [द्वि–> दो–> दु, + आह्वान (बुलाना, टेरना) –> हाई = दुहाई]। अथवा [दु (दो)> दुह (जैसे दुहाजू में) + आई प्रत्यय, (जैसे- इकाई, दहाई, तिहाई, चौथाई में)] प्रयोग के अनुसार अर्थ है– दो बार पुकारना, घोषणा करना, जैसे– बचाओ-बचाओ, रक्षा करो - रक्षा करो, जय हो-जय हो की दुहरी पुकार। घोषणा होना, डंका पीटना, मुनादी करना भी दुहाई का अर्थ है। बैठे राम राजसिंहासन जग में फिरी दुहाई ।   संकट या आपत्ति आने पर रक्षा के लिये पुकारना; जैसे बचाओ, बचाओ! त्राहि माम्, त्राहि माम्। अपने बचाव के लिये किसी का नाम लेकर पुकारना।  दुहाई एक प्रकार से दया/न्याय की अपील भी है। दुहाई का एक अर्थ शपथ या सौगंद भी है। राम दुहाई (राम की कसम)। नाथ सपथ पितु चरन दुहाई । भयउ न भुवन भरत सम भाई॥ —तुलसी दुहना क्रिया से भाववाचक संज्ञा भी बनती है दुहाई, अर्थात् दुहने का भाव, दोहन। ♦️
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ख़ानापूरी, खानापूर्ति

ख़ानापूरी, खानापूर्ति  ख़ानापूरी خانَہ پُری फ़ारसी से आया हुआ शब्द है, जिसका अर्थ है किसी चक्र, प्रपत्र या सारणी (फ़ार्म या रजिस्टर) के ख़ानों में चाही गई जानकारी आदि यथास्थान लिखना, नक्शा भरना। वस्तुत: शुद्ध रूप तो ख़ाना पुरी है और यह पुरी हिंदी क्रिया पुरना/पुराना से है जो हिंदी फ़ारसी दोनों में है। अर्थ है भरना– शर्त पुराना , चौक पुरना। बहु विधि आरति साजि तो चौक पुरावहीं। —कबीर   बिहार में भूमि सर्वेक्षण के एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ को भी ख़ानापूरी कहा जाता है जिसमें प्रत्येक भूमि मालिक का नाम, पता, ज़मीन का क्षेत्रफल समेत अनेक जानकारियाँ भरी होती हैं। खानापूरी का लाक्षणिक अर्थ है– केवल दिखावे के लिये बेमन से काम करना।औपचारिक कार्रवाई; केवल दिखावे के लिए किया गया कार्य खानापूरी कहा जाता है। इसके लिए एक मुहावरा भी चल रहा है- रोग काटना। खानापूर्ति हिंदी का नवनिर्मित शब्द है– खाना (भोजन) की पूर्ति (भरण), फूड सप्लाई। फ़ारसी के ख़ानापूरी को विदेशी और अशुद्ध मानकर उसका यथासंभव संस्कृतीकरण किया हुआ रूप है खानापूर्ति, जिसे शुद्धतावादी खानापूरी का पर्यायवाची मान ले रहे है।...

बिंदास कथा …!

आइपीएल ने सत्र 2026 के लिए नारा दिया है– "जब मौका हो ख़ास, खेलो बिंदास! एक मित्र ने पूछा है– यह बिंदास शब्द कहाँ से आया? बना कैसे?  प्रत्येक शब्द की उत्पत्ति के लिए संस्कृत की ओर मुड़ने वाले लोग तो बिंदास को संस्कृत के "विना + दास्य" शब्द से जोड़ते हैं; दास + प्यञ्! दास्य शब्द का अर्थ है दासता, गुलामी, सेवा, अधीनता। इसके अभाव के अर्थ में बिंदास का प्रयोग कहीं देखा नहीं गया। आमतौर पर माना जाता है कि बिंदास मराठी से हिंदी में आया। यह मत तर्कसंगत भी लगता है। एक ज़माना था जब बोलचाल की हिंदी और अनेक बोलियों-भाषाओं के शब्द फ़िल्म नगरी से होकर आया करते थे। तब फ़िल्मों की भाषा भी बोलचाल की हिंदी, (उर्दू-हिंदी) हुआ करती थी। अब तो आप जानते हैं फ़िल्में अंग्रेजी के साथ-साथ गाली-गलौज तक निस्संकोच परोस रही हैं और बिंदास परोस रही हैं। तो आइए, हम भी बिंदास होकर बिंदास की बात करें। बिंदास की उत्पत्ति खोजने के लिए हमें अरबी तक जाना पड़ेगा। अरबी में एक शब्द है– 'दहशत', जिसका अर्थ है ख़ौफ़, डर, भय, आतंक, टेरर। इसीलिए आजकल टेरेरिस्टों को दहशतगर्द कहा जाता है। दहशतगर्द ने जब दहशत फै...

//ज्ञान// की बात

/ज्ञ/ में दो ध्वनियाँ ज्+ञ हैं, जिसे उत्तर भारत में प्रायः 'ग्यँ' बोला जाता है, इसलिए ज् +ञान (ज्ञान ) का उच्चारण 'ग्याँन' किया जाता है; यद्यपि शब्द में ग् ध्वनि कहीं नहीं है। ञ को यँ का समध्वनिक मानने से ज्ञान= ग्याँन। जो ज् को ञ के साथ बोल सकते हैं, उनका उच्चारण 'ज्यँ' सुनाई पड़ता है, इसलिए ज्ञान> ज्याँन।  रोमन लिप्यंतरण में ज्ञान (ग्याँन)> Gyān और ज्ञान (ज्याँन)> jnāna (jñāna) लिखा जाता है। ओड़िया, तेलुगु, मलयालम, तमिल में भी ज्ञान को gnāna ही कहते हैं। शायद कन्नड़ में भी। परंतु जब दक्षिण के संस्कृत पंडित अंग्रेजी (रोमन) में लिखते हैं तो jnāna और gnāna दोनों का प्रयोग करते हैं। कोंकणी में ज्ञ का उच्चारण "ग्न्य" जैसा होता है और मराठी में "द्न्य" जैसा– "द्न्यान"। कोंकणी में ज्ञान का उच्चारण "ग्न्यान", "द्न्यान" होता है और कहीं-कहीं ज्ञान भी।   नासिक्य /ञ/ ध्वनि का लिप्यंतरण /n/ से ही हो सकता है। उससे पूर्व /ज्/ को कहीं /ग/ और कहीं /ज/ बोला जाता है। इसलिए कहीं gyān, gnān, और कहीं jnāna. सं...

अदा करना , अता करना

नमाज़ अदा की जाती है, अता नहीं (Photo courtesy: wiki commons) अदा – अरबी से आया हुआ शब्द है। इस्लामी धर्मशास्त्र के अनुसार अदा करना का अर्थ है निश्चित समय पर पूजा-अर्चना करना, वह प्रार्थना जो निश्चित समय पर की जाए। ऋण इत्यादि का भुगतान भी अदा करना कहलाता है।  इसके अतिरिक्त किसी निबंध या विचार इत्यादि का व्याख्यान अथवा अभिव्यक्ति की शैली को भी अदा कहते हैं। आँख का संकेत, प्रेमियों के समान रंग-ढंग, नाज़-नखरे भी अदा के अंतर्गत आते हैं। अता – यह भी अरबी शब्द है, अर्थ है बड़ों की ओर से छोटों को मिलने वाला दान, इनाम, पुरस्कार, बख्शीश देना;जैसे अल्लाह की अता‌एँ। वो जिस ने आँख अता की है देखने के लिए उसी को छोड़ के सब कुछ दिखाई देता है। (~ज़ुबैर अली ताबिश) ♦️

कांजी हाउस कथा…

काँजी हाउस सुने हैं कभी? खेती को हानि पहुँचाने वाले, अनारक्षित, आवारा मवेशियों (गाय, बैल, गधे, बकरियाँ आदि) को पकड़ कर रखने और बाद में उनके स्वामियों से दंड वसूल करने के लिए नगर पालिकाओं, पंचायतों आदि के द्वारा कुछ पशुबाड़े बनाए जाते हैं जिन्हें काँजी हाउस कहा जाता है। सरकार अथवा सरकार द्वारा सहायता प्राप्त निजी संस्थाओं के द्वारा काँजी हाउसों की व्यवस्था की जाती है। इन्हें बोलचाल में काजी हौस भी कहा जाता है लेकिन इनका किन्हीं 'काज़ी' साहब से कोई संबंध नहीं है। काँजी हाउस शब्द की उत्पत्ति और अर्थ विस्तार की कथा बड़ी रोचक है। उधर दक्षिण का एक लोकप्रिय घरेलू पेय पदार्थ है- कंजी, जो भात को कुछ घंटों के लिए रात भर पानी में भिगोकर बनाया जाता है और बहुत पौष्टिक होता है। अंग्रेज बहादुर के राजकाज के शुरुआती दिनों में, (अंग्रेजों का शुरुआती प्रमुख केंद्र मद्रास था) सेना के भारतीय सैनिक जब कच्ची शराब पी लेते (पक्की तो उन्हें नसीब हो नहीं सकती थी) और उसके नशे में उद्दंडता या दुर्व्यवहार करते हुए पकड़े जाते तो उन्हें कुछ दिन के लिए बाकी सैनिकों से अलग बने हुए किसी घर में भेज दिया दिया जा...

दालचीनी के बहाने...

दालचीनी दालचीनी भी बड़ा अजीब शब्द है। इसमें न तो दाल है, न चीनी। थोड़ी सी मिठास है, जो तीखेपन से दब जाती है। और दाल? दाल तो न अरहर, न मूँग-मसूर; न साबुत, न धुली‌। मिलती है पेड़ की छाल से। दरअसल दालचीनी शब्द अरबी से शाही तोहफ़े के रूप में भारत आया । दालचीनी पैदा होती थी इंडोनेशिया में। वहाँ से चीन, और चीन से रेशमी मार्ग से होकर सार्थवाहों के साथ पहुँची अरब। अरब वालों ने देखा कि यह तो चीन से आई हुई मसाले वाली दार (लकड़ी) है, तो नाम हो गया दार-उल-चीनी (चीन क लकड़ी! और भारत में दालचीनी बनकर हमारी रसोई को सुगंधित कर रही है। हम में से जो अरबी-फ़ारसी से परहेज़ करते हैं वे भी दालचीनी के बिना नहीं रह सकते। संस्कृत में दालचीनी को उसके स्वाद के आधार पर ही नाम दिया गया। संस्कृत में दालचीनी को दारुसिता (सिता= चीनी) अर्थात चीनी जैसी मीठी लकड़ी, त्वक् (त्वचा, छाल), गुडत्वक् (गुड़ जैसी मीठी छाल) कहा जाता है। आयुर्वेद में दालचीनी को अनेक रोगों में लाभदायक बताया गया है। ♦️