"आप अच्छी-बुरी आदतों के आदी होते हैं आदि नहीं।" यह केवल एक साधारण वाक्य नहीं, बल्कि हिंदी भाषा के सौंदर्य और उसके व्याकरणिक विश्लेषण में छिपा एक गहरा जीवन-दर्शन है। अक्सर हम लिखते और बोलते समय छोटी 'इ' और बड़ी 'ई' की मात्राओं को बहुत हल्के में ले लेते हैं, लेकिन 'आदि' और 'आदी' का यह सूक्ष्म अंतर हमारे अस्तित्व के दो छोरों को परिभाषित कर देता है। इसका प्रारंभ होता है छोटी 'इ' की मात्रा वाले विशेषण 'आदि' से, जिसके मूलतः दो अर्थ हैं— किसी चीज़ का 'प्रारंभ या शुरूआत' (जैसे- आदि मानव, आदिकाल) और दूसरा किसी सूची को समेटने वाला अव्यय 'इत्यादि'। इसके ठीक उलट, जब 'द' पर बड़ी 'ई' की मात्रा जुड़ती है, तब जन्म लेता है 'आदी' जिसका सीधा संबंध इंसान के स्वभाव, उसके अभ्यास और उसकी जीती-जागती, प्रिय-अप्रिय आदतों से है। जब इस सूक्ष्म व्याकरण को ध्यान में रखकर हम मूल वाक्य को देखते हैं, तो इसकी मारक क्षमता और प्रभावोत्पादकता खुलकर सामने आती है। यह पंक्ति सीधे हमारे अस्तित्व पर चोट करती है कि एक मनुष्य के रूप ...
‘मैं आपके घर आ रखा हूँ, आप कहाँ जा रखे हैं?' हम दिनभर में न जाने कितने ऐसे वाक्य बोलते हैं, जो हमारे कानों को बिल्कुल सहज लगते हैं। दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अब उत्तराखंड में भी ऐसे वाक्य अक्सर सुनाई देते हैं—“हाँ भाई, मैं स्टेशन पर आ रखा हूँ” या “वह तो कब का जयपुर जा रखा है।” बोलने वाले को अपनी बात एकदम साफ़ लगती है और सुनने वाला भी समझ जाता है कि अगला पहुँच चुका है। लेकिन ज़रा ठहरकर सोचिए—क्या हिंदी का व्याकरण भी इस बात को उतनी ही आसानी से हजम कर लेता है? जवाब है—नहीं। ‘आ रखा हूँ’ और ‘जा रखा हूँ’ में अनजाने ही दो अलग-अलग क्रियाओं का ऐसा घाल-मेल हो गया है, जिसे मानक हिंदी का व्याकरण सहज नहीं मानता। ‘रखना’ मूलतः सकर्मक क्रिया है—किसी वस्तु को कहीं रखा जाता है: “मैंने किताब मेज पर रख दी है।” इसके विपरीत ‘आना’ और ‘जाना’ अकर्मक क्रियाएँ हैं—इन्हें किसी कर्म की आवश्यकता नहीं होती। यहीं से गड़बड़ शुरू होती है। ‘रखना’ जब सहायक या रंजक क्रिया के रूप में आता है, तो सामान्यतः सकर्मक क्रियाओं के साथ जुड़ता है—“मैंने पत्र लिख रखा है”, “पैसे बचा रखे हैं।” लेकिन ‘आना’ और ‘...