//शब्द किसी भाषा में सबसे छोटी स्वतंत्र इकाई है जो भाषाओं की सीमा के आर-पार आवाजाही कर सकता है। // यह कथन हिंदी ही नहीं, विश्व की किसी भी भाषा के संदर्भ में सत्य है । शब्दों के भीतर की छेड़छाड़ उनकी आंतरिक रासायनिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं होगी। हिंदी के 'तद्भव' शब्द निरंतर लोक प्रयोग से घिसकर बने हैं। 'देशज' इसी मिट्टी से जन्मे हैं। अन्य अनेक भाषाओं से आगत शब्द भी दो-तीन सदियों से आम चलन में हैं और हिंदी के शब्दभंडार में समा चुके हैं। शिष्ट प्रयोग/शुद्धीकरण के नाम पर उनके स्थान पर फिर से तत्सम शब्दों को लाना या गढ़ना भाषा के विकास को उलटना है। आगत शब्दों का चलन संस्कृत में भी था। स्वयं महर्षि पाणिनि इसे स्वीकार करते हैं। आज भी हिन्दी में ही नहीं, सभी भारतीय भाषाओं में आगत शब्द प्राप्त होते हैं क्योंकि शब्दों का आदान-प्रदान जीवित भाषाओं की पहचान है। कोई भाषा न तो विद्वानों के बनाए बनती है, न सुपठित प्रयोक्ताओं के। बहते प्रवाह को आप लाख कहें कि मेरे गाँव के निकट बहा करो, वह अपना मार्ग छोड़कर आपको भगीरथ मानकर आपके पीछे नहीं चल पड़ेगा। भगीरथ प्रयत्न करने के बाद भी आप भाषा...
कुल व्यू
||वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये ||
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