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'क्याप' और 'कसप' की अर्थ छबियाँ

मनोहर श्याम जोशी के दो प्रसिद्ध उपन्यास हैं – 'क्याप' और 'कसप'। दोनों उपन्यासों की हिंदी को 'कुमाउँनी हिंदी' कहा जा सकता है क्योंकि उपन्यासों में अनेक कुमाउँनी शब्दों का प्रयोग हुआ है और वाक्य रचना की शैली भी कुमाउँनी से अत्प्रयधिक भावित है। दोनों उपन्यासों के नाम अपने आप में रहस्य हैं और पाठक को उनका अर्थ धीरे-धीरे स्पष्ट होता है। आइए, दोनों पर क्रमशः संक्षेप में विचार करें। क्याप "आप कहेंगे कि यह कथा तो क्याप-जैसी हुई ! धैर्य-धन्य पाठको, यही तो रोना है।"  ~मनोहर श्याम जोशी क्याप दो घटकों से निर्मित होता है– /क्या/ सर्वनाम (यहाँ अनिश्चयवाचक) और निपात /प/। क्याप का हिंदी में कोई समानार्थी शब्द नहीं, और कुमाईं में इसकी अनेक अर्थ छबियाँ हैं! उन्हें कुमाउँनी के संदर्भ में समझना ही उपयोगी होगा।  कुछ प्रयोग किस प्रकार हैं – * क्याप भै = अजीब, अनगढ़, निराशाजनक, बेकार * क्याप है गो != जाने क्या हो गया * क्याप छु हात में = कुछ अनजाना है... *भोव क्याप हो = भविष्य अनिश्चित है * हमरि क्याप = हमारी बला से * क्याप चितुणयूँ = अजीब-सी बेचैनी  * क्याप है पड़...

हास्यास्पद लिंग निर्धारण

बराबरी की हास्यास्पद पहल  हिंदी के साथ आपराधिक छेड़छाड़ करने में नवभारत टाइम्स नाम का यह प्रमुख राष्ट्रीय पत्र सबसे आगे रहा है। इन्हें कोई बताए कि हिंदी में पदवाची नाम लिंग निरपेक्ष होते हैं।  किसी भी भाषा का एक सतत प्रवाह होता है। वह अचानक उत्पन्न नहीं होती। उसका इतिहास होता है और भविष्य भी। यह बात और है कि भाषा का भविष्य उसे वर्तमान में  बरतने वालों के हाथ में होता है। वे चाहें तो अपनी भाषा का बेड़ा ग़र्क भी कर सकते हैं और चाहे तो उसे डूबने से बचा भी सकते हैं।  "दुनिया में पहली बार बराबरी की भाषा" का आविष्कार करने का दावा करने वाले नभाटा के इन भाषा विशेषज्ञों से पूछा जाए कि प्रत्येक संज्ञा और विशेषण शब्द का स्त्री लिंग बनाने की पहल करने की भाषिक आवश्यकता क्या है? कौन यह परामर्श दे रहा है और यह सत्प्रयत्न स्वयं हिंदी भाषा के प्रति और उसके वरतने वालों के प्रति कितना न्याय संगत है। बल्लेबाज का स्त्रीलिंग 'बल्लेबाजनी', वैज्ञानिक का 'वैज्ञानिका' और सबसे हास्यास्पद प्रयास विधायक के लिए 'विधायिका'! जबकि विधायिका हिंदी में लेजिस्लेचर के लिए स्वीकृत और बहुप्र...

अनड्वान

अनड्वान  कुमाऊँ में अर्थ की दृष्टि से निगरगंड वर्ग का ही एक अन्य शब्द प्रचलित है– अनड्वान्। यह हिंदी में कम प्रचलित है, यद्यपि कुछ शब्दकोशों नेे इसका या इसकेे मूल प्रातिपदिक अनडुह् का उल्लेख किया है। अनड्वान शब्द की यात्रा बड़ी रोचक है। इसकी उत्पत्ति अनडुह् शब्द से है और जिसका शाब्दिक अर्थ है– अन (रथ, गाड़ी) को हाँकने वाला अनडुह्। 'अनडुह्' प्रातिपदिक का प्रथमा, एकवचन– अनड्वान् ।  इस प्रकार अनड्वान का पहला ही अर्थ हो गया बैल, और लक्षणा से गृहस्थी के रथ को हाँकने वाला अर्थात् परिवार का मुखिया। काल के रथ को निरंतर चलाने वाला हमारे सौर जगत का वह सबसे बड़ा और ज्वलंत तारा जिससे सब ग्रहों को ऊष्मा और प्रकाश मिलते हैं, अर्थात् सूर्य को भी अनड्वान कहा जाता है। बृहस्पति का भी एक नाम अनड्वान है। वेदों में अनड्वान् के  अनेक उल्लेख हैं । अनड्वान् अनेक मंत्रों के दृष्टा ऋषि हैं। अथर्ववेद में एक पूरे सूक्त को अनड्वान सूक्त कहा जाता है। "अनड्वानिन्द्रः स पशुभ्यो वि चष्टे त्रयां छक्रो वि मिमीते अध्वनः।  भूतं भविष्यद्भुवना दुहानः सर्वा देवानां चरति व्रतानि ॥" (अथर्ववेद– 4.11.2) यह म...

आकलन या आँकलन

अनेक सिद्ध लेखक, प्रसिद्ध  संपादक, अनुभवी अनुवादक शब्दों की व्युत्पत्ति संबंधी अज्ञान या अधूरे ज्ञान के कारण आकलन को आँकलन लिखते पाए जाते हैं। सामान्य जन भी गीता में भगवान कृष्ण के वचनों को ध्यान में रखते हुए उन्हें ही श्रेष्ठ आदर्श मानकर अनुकरण करते हैं और शब्दों की ऐसी वर्तनी चल पड़ती है जो भाषा में सही नहीं है।  आकलन (estimation, assessment), कलन (calculation) से आ उपसर्ग लगाकर व्युत्पन्न होता है। मूल संस्कृत शब्द कलन (√कल्+ल्युट्) 'जानना, समझना, बोध पाना' से ही काल शब्द बना है। आकलन करना संपूर्ण जाँच-परख करना। 'आँकलन' कोई शब्द नहीं है। कुछ लोग अंक (digit, number) से आँक और आँक से आँकलन, ऐसी व्युत्पत्ति करते हैं, जो भ्रामक है। अंकन तत्सम से आँकना बनेगा, बीच में //ल// कैसे आ जाएगा! समस्या तो आँकलन की है, आँकना की नहीं। असल में कुछ क्षेत्रों में शुद्ध स्वरों को अनुनासिक बनाकर उच्चारण किया जाता है अर्थात नाक से बोला जाता है; जैसे– डाकिया> डाँकिया, पान> पाँन। संभवत: इसीलिए आकलन को भी आँकलन कह दिया जाता है और भ्रमवश उसे शुद्ध मान लिया जाता है। कुल मिलाकर आँकलन भ्राम...

खेत की बात क्षेत्र से… …!

 सिख धर्म के तीसरे गुरु, गुरु श्री अमरदास जी का प्रसिद्ध कथन है– "सूरा सो पहचानिए, जो लरै दीन के हेत, न पुरजा-पुरजा कट मरै, कबहुँ न छाँड़ै खेत॥"  खेत संस्कृत के क्षेत्र से बना है और बहु-अर्थी शब्द है। संस्कृत में क्षेत्र का अर्थ खेत, भूमि, बाड़ा या मैदान के अतिरिक्त देह , विस्तार, पत्नी आदि भी है। अनेक तीर्थस्थानों को भी क्षेत्र कहा गया है।  हिंदी में सामान्यतः हम उस भूमिखंड को खेत कहते हैं जो जोतने-बोने और अन्न, शाक-सब्ज़ी आदि की फसल उगाने के योग्य हो। प्रदेश, इलाका, भूभाग या मंडल भी क्षेत्र कहलाता है। किसी देश या दुनिया का एक विशेष हिस्सा भी क्षेत्र है, जो अपनी भौगोलिक, प्राकृतिक या सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण अन्य क्षेत्रों से अलग पहचाना जाता है। विशेषता के अनुसार ही आकार में यह छोटा भी हो सकता है (जैसे- हिंदी भाषी क्षेत्र) और विस्तृत भी (जैसे- यूरोपीय क्षेत्र)। पुराने ज़माने में लड़ाइयाँ विशाल मैदान में आमने-सामने हुआ करती थीं, इसलिए युद्धक्षेत्र, रणक्षेत्र, लड़ाई के मैदान को भी खेत कहा गया। हतौं न खेत खेलाइ खेलाई ।  तोहि अबहि का करौं बड़ाई । —मानस, ६ । ३४ ।...

दुहाई है

दुहाई [द्वि–> दो–> दु, + आह्वान (बुलाना, टेरना) –> हाई = दुहाई]। अथवा [दु (दो)> दुह (जैसे दुहाजू में) + आई प्रत्यय, (जैसे- इकाई, दहाई, तिहाई, चौथाई में)] प्रयोग के अनुसार अर्थ है– दो बार पुकारना, घोषणा करना, जैसे– बचाओ-बचाओ, रक्षा करो - रक्षा करो, जय हो-जय हो की दुहरी पुकार। घोषणा होना, डंका पीटना, मुनादी करना भी दुहाई का अर्थ है। बैठे राम राजसिंहासन जग में फिरी दुहाई ।   संकट या आपत्ति आने पर रक्षा के लिये पुकारना; जैसे बचाओ, बचाओ! त्राहि माम्, त्राहि माम्। अपने बचाव के लिये किसी का नाम लेकर पुकारना।  दुहाई एक प्रकार से दया/न्याय की अपील भी है। दुहाई का एक अर्थ शपथ या सौगंद भी है। राम दुहाई (राम की कसम)। नाथ सपथ पितु चरन दुहाई । भयउ न भुवन भरत सम भाई॥ —तुलसी दुहना क्रिया से भाववाचक संज्ञा भी बनती है दुहाई, अर्थात् दुहने का भाव, दोहन। ♦️

ख़ानापूरी, खानापूर्ति

ख़ानापूरी, खानापूर्ति  ख़ानापूरी خانَہ پُری फ़ारसी से आया हुआ शब्द है, जिसका अर्थ है किसी चक्र, प्रपत्र या सारणी (फ़ार्म या रजिस्टर) के ख़ानों में चाही गई जानकारी आदि यथास्थान लिखना, नक्शा भरना। वस्तुत: शुद्ध रूप तो ख़ाना पुरी है और यह पुरी हिंदी क्रिया पुरना/पुराना से है जो हिंदी फ़ारसी दोनों में है। अर्थ है भरना– शर्त पुराना , चौक पुरना। बहु विधि आरति साजि तो चौक पुरावहीं। —कबीर   बिहार में भूमि सर्वेक्षण के एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ को भी ख़ानापूरी कहा जाता है जिसमें प्रत्येक भूमि मालिक का नाम, पता, ज़मीन का क्षेत्रफल समेत अनेक जानकारियाँ भरी होती हैं। खानापूरी का लाक्षणिक अर्थ है– केवल दिखावे के लिये बेमन से काम करना।औपचारिक कार्रवाई; केवल दिखावे के लिए किया गया कार्य खानापूरी कहा जाता है। इसके लिए एक मुहावरा भी चल रहा है- रोग काटना। खानापूर्ति हिंदी का नवनिर्मित शब्द है– खाना (भोजन) की पूर्ति (भरण), फूड सप्लाई। फ़ारसी के ख़ानापूरी को विदेशी और अशुद्ध मानकर उसका यथासंभव संस्कृतीकरण किया हुआ रूप है खानापूर्ति, जिसे शुद्धतावादी खानापूरी का पर्यायवाची मान ले रहे है।...

बिंदास कथा …!

आइपीएल ने सत्र 2026 के लिए नारा दिया है– "जब मौका हो ख़ास, खेलो बिंदास! एक मित्र ने पूछा है– यह बिंदास शब्द कहाँ से आया? बना कैसे?  प्रत्येक शब्द की उत्पत्ति के लिए संस्कृत की ओर मुड़ने वाले लोग तो बिंदास को संस्कृत के "विना + दास्य" शब्द से जोड़ते हैं; दास + प्यञ्! दास्य शब्द का अर्थ है दासता, गुलामी, सेवा, अधीनता। इसके अभाव के अर्थ में बिंदास का प्रयोग कहीं देखा नहीं गया। आमतौर पर माना जाता है कि बिंदास मराठी से हिंदी में आया। यह मत तर्कसंगत भी लगता है। एक ज़माना था जब बोलचाल की हिंदी और अनेक बोलियों-भाषाओं के शब्द फ़िल्म नगरी से होकर आया करते थे। तब फ़िल्मों की भाषा भी बोलचाल की हिंदी, (उर्दू-हिंदी) हुआ करती थी। अब तो आप जानते हैं फ़िल्में अंग्रेजी के साथ-साथ गाली-गलौज तक निस्संकोच परोस रही हैं और बिंदास परोस रही हैं। तो आइए, हम भी बिंदास होकर बिंदास की बात करें। बिंदास की उत्पत्ति खोजने के लिए हमें अरबी तक जाना पड़ेगा। अरबी में एक शब्द है– 'दहशत', जिसका अर्थ है ख़ौफ़, डर, भय, आतंक, टेरर। इसीलिए आजकल टेरेरिस्टों को दहशतगर्द कहा जाता है। दहशतगर्द ने जब दहशत फै...

//ज्ञान// की बात

/ज्ञ/ में दो ध्वनियाँ ज्+ञ हैं, जिसे उत्तर भारत में प्रायः 'ग्यँ' बोला जाता है, इसलिए ज् +ञान (ज्ञान ) का उच्चारण 'ग्याँन' किया जाता है; यद्यपि शब्द में ग् ध्वनि कहीं नहीं है। ञ को यँ का समध्वनिक मानने से ज्ञान= ग्याँन। जो ज् को ञ के साथ बोल सकते हैं, उनका उच्चारण 'ज्यँ' सुनाई पड़ता है, इसलिए ज्ञान> ज्याँन।  रोमन लिप्यंतरण में ज्ञान (ग्याँन)> Gyān और ज्ञान (ज्याँन)> jnāna (jñāna) लिखा जाता है। ओड़िया, तेलुगु, मलयालम, तमिल में भी ज्ञान को gnāna ही कहते हैं। शायद कन्नड़ में भी। परंतु जब दक्षिण के संस्कृत पंडित अंग्रेजी (रोमन) में लिखते हैं तो jnāna और gnāna दोनों का प्रयोग करते हैं। कोंकणी में ज्ञ का उच्चारण "ग्न्य" जैसा होता है और मराठी में "द्न्य" जैसा– "द्न्यान"। कोंकणी में ज्ञान का उच्चारण "ग्न्यान", "द्न्यान" होता है और कहीं-कहीं ज्ञान भी।   नासिक्य /ञ/ ध्वनि का लिप्यंतरण /n/ से ही हो सकता है। उससे पूर्व /ज्/ को कहीं /ग/ और कहीं /ज/ बोला जाता है। इसलिए कहीं gyān, gnān, और कहीं jnāna. सं...

अदा करना , अता करना

नमाज़ अदा की जाती है, अता नहीं (Photo courtesy: wiki commons) अदा – अरबी से आया हुआ शब्द है। इस्लामी धर्मशास्त्र के अनुसार अदा करना का अर्थ है निश्चित समय पर पूजा-अर्चना करना, वह प्रार्थना जो निश्चित समय पर की जाए। ऋण इत्यादि का भुगतान भी अदा करना कहलाता है।  इसके अतिरिक्त किसी निबंध या विचार इत्यादि का व्याख्यान अथवा अभिव्यक्ति की शैली को भी अदा कहते हैं। आँख का संकेत, प्रेमियों के समान रंग-ढंग, नाज़-नखरे भी अदा के अंतर्गत आते हैं। अता – यह भी अरबी शब्द है, अर्थ है बड़ों की ओर से छोटों को मिलने वाला दान, इनाम, पुरस्कार, बख्शीश देना;जैसे अल्लाह की अता‌एँ। वो जिस ने आँख अता की है देखने के लिए उसी को छोड़ के सब कुछ दिखाई देता है। (~ज़ुबैर अली ताबिश) ♦️

कांजी हाउस कथा…

काँजी हाउस सुने हैं कभी? खेती को हानि पहुँचाने वाले, अनारक्षित, आवारा मवेशियों (गाय, बैल, गधे, बकरियाँ आदि) को पकड़ कर रखने और बाद में उनके स्वामियों से दंड वसूल करने के लिए नगर पालिकाओं, पंचायतों आदि के द्वारा कुछ पशुबाड़े बनाए जाते हैं जिन्हें काँजी हाउस कहा जाता है। सरकार अथवा सरकार द्वारा सहायता प्राप्त निजी संस्थाओं के द्वारा काँजी हाउसों की व्यवस्था की जाती है। इन्हें बोलचाल में काजी हौस भी कहा जाता है लेकिन इनका किन्हीं 'काज़ी' साहब से कोई संबंध नहीं है। काँजी हाउस शब्द की उत्पत्ति और अर्थ विस्तार की कथा बड़ी रोचक है। उधर दक्षिण का एक लोकप्रिय घरेलू पेय पदार्थ है- कंजी, जो भात को कुछ घंटों के लिए रात भर पानी में भिगोकर बनाया जाता है और बहुत पौष्टिक होता है। अंग्रेज बहादुर के राजकाज के शुरुआती दिनों में, (अंग्रेजों का शुरुआती प्रमुख केंद्र मद्रास था) सेना के भारतीय सैनिक जब कच्ची शराब पी लेते (पक्की तो उन्हें नसीब हो नहीं सकती थी) और उसके नशे में उद्दंडता या दुर्व्यवहार करते हुए पकड़े जाते तो उन्हें कुछ दिन के लिए बाकी सैनिकों से अलग बने हुए किसी घर में भेज दिया दिया जा...

दालचीनी के बहाने...

दालचीनी दालचीनी भी बड़ा अजीब शब्द है। इसमें न तो दाल है, न चीनी। थोड़ी सी मिठास है, जो तीखेपन से दब जाती है। और दाल? दाल तो न अरहर, न मूँग-मसूर; न साबुत, न धुली‌। मिलती है पेड़ की छाल से। दरअसल दालचीनी शब्द अरबी से शाही तोहफ़े के रूप में भारत आया । दालचीनी पैदा होती थी इंडोनेशिया में। वहाँ से चीन, और चीन से रेशमी मार्ग से होकर सार्थवाहों के साथ पहुँची अरब। अरब वालों ने देखा कि यह तो चीन से आई हुई मसाले वाली दार (लकड़ी) है, तो नाम हो गया दार-उल-चीनी (चीन क लकड़ी! और भारत में दालचीनी बनकर हमारी रसोई को सुगंधित कर रही है। हम में से जो अरबी-फ़ारसी से परहेज़ करते हैं वे भी दालचीनी के बिना नहीं रह सकते। संस्कृत में दालचीनी को उसके स्वाद के आधार पर ही नाम दिया गया। संस्कृत में दालचीनी को दारुसिता (सिता= चीनी) अर्थात चीनी जैसी मीठी लकड़ी, त्वक् (त्वचा, छाल), गुडत्वक् (गुड़ जैसी मीठी छाल) कहा जाता है। आयुर्वेद में दालचीनी को अनेक रोगों में लाभदायक बताया गया है। ♦️

खाना, बुकाना और बुकनी

संस्कृत √वृक्ण - व्रश्च् (छेदे– कुतरना) + क्त (भूत.कृदंत) कटा हुआ, बाँटा हुआ, फाड़ा हुआ, कतरा हुआ। वृक्ण से हिंदी में बुकना, बुकनी, बुकाना। कुमाउँनी में बुकूण (बुकाना) क्रिया है। कच्चे चावल (खाजा), खजिया, शिरोल, चिवड़ा बुकाए जाते हैं, अर्थात मुँह में रखकर धीरे-धीरे दाँतों से पीसकर चूरा बनाते हुए खाए जाते हैं। नेपाली, मैथिली में भी बुकना, बुकाना हैं। बुकनू, बुकनी चूर्ण (पाउडर ) के लिए हैं। नमक की बुकनी, मिर्च-मसालों की बुकनी, अबीर-गुलाल की बुकनी आदि प्रयोग सुनाई पड़ते हैं। एक प्रसिद्ध चाय कंपनी "बुकनी चाय" के नाम से डस्ट टी बेचा करती थी।  बुकनू एक बहु उपयोगी चूर्ण उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विविध व्यंजनों में मिलाकर बड़े चाव से खाया जाता है। कनपुरिया बुकनू, बुंदेलखंडी बुकनू, कनौजिया बुकनू आदि अनेक सुप्रसिद्ध प्रभेद सुनाई पड़ते हैं। ♦️ भोजन करने के लिए खाना क्रिया यद्यपि पूरे उत्तर भारत में है, कुमाऊँ में इसके लिए कुछ विशेष क्रियाएँ और भी हैं; जैसे भसकूण (भस्काना), बुकूण (बुकाना), कोचीण (कूँचना), धपोड़ण (धपड़ना), सपोड़ण (सपोड़ना, चट कर जाना)। भसकूण (भसकना) संस्कृत भक्षण स...

खी-खी के बहाने …!

खी-खी के बहाने हाहा-हूहू, ही-ही या खी-खी के बहाने किसी की खिल्ली उड़ाना ठीक नहीं। हिंदी में ये सभी विस्मय, आनंद, आमोद आदि मनोभावों को बताने वाले अव्यय हैं। इनका व्यावहारिक प्रयोग और उचित संदर्भ समझ लेना ज़रूरी है।   अमरकोश के अनुसार "हाहा हूहू" गंधर्वों को कहा जाता है जो देवयोनि में माने जाते हैं। वे अपने क्रियाकलापों से देवताओं को प्रसन्न रखते हैं। "हाहा हूहूश्चैवमाद्या गन्धर्वास्त्रिदिवौकसाम्।" ~अमरकोश 'हा-हा' पीड़ा, शोक या आश्चर्य का प्रकट करने वाला उद्गार है। हिंदी शब्दकोशों के अनुसार हाहा-हूहू ऊधम बाज़ी, हो-हल्ला, शोरगुल को व्यक्त करता है। हा-हा उन्मुक्त अट्टहास के लिए भी है तथा शोक और कष्ट व्यक्त करने के लिए भी। 'ही-ही' भी अव्यय है। आप्टे के अनुसार ही+ही आश्चर्य और प्रमोद को प्रकट करने वाला अव्यय है। रही बात खी-खी की। यह अनुकरणात्मक शब्द है जो हँसने की विशेष रूप से अप्रिय और चुभने वाली आवाज़ का संकेत करता है। 'खि' और 'खी' से अर्थ संकेत में बड़ा अंतर आया है। जैसे खिलखिलाना, खिलखिलाहट (कुमाउँनी में खितखिताट) में त्वरित और उन्मु...

शब्द चर्चा: साध्वी

साध्वी चर्चा   आजकल धार्मिक चोले के साथ राजनीति करने वाली अनेक स्त्रियाँ अपने नाम के आगे 'साध्वी' विशेषण जोड़ती हैं। X (पूर्व ट्विटर) पर एक अनुसारक ने पूछा– क्या साध्वी शब्द का संबंध सधवा, विधवा से है? क्या इन शब्दों का मूल एक है? समाधान में कहना पड़ा– नहीं, ऐसा नहीं है। संस्कृत में 'धव' का अर्थ है पति। विधवा का अर्थ हुआ जिसका 'धव' न हो अर्थात जो पति से रहित हो गई है; और विधवा का विलोम शब्द 'सधवा' अर्थात पति सहित नारी, जिसे सौभाग्यवती भी कहा जाता है।  साध्वी साधु से बना स्त्रीलिंग (साधु+ ई) सर्वथा भिन्न शब्द है। अमरकोश के अनुसार 'साध्वी' पतिव्रता को कहा जाता है।  पतिव्रता की व्याख्या अनेक पुराणों, स्मृतियों और कोश ग्रंथों में भिन्न-भिन्न प्रकार से की गई है। आज की भाषा में कहें तो सब परिभाषाओं के पीछे पुरुषवादी दृष्टिकोण है; जैसे हारीत स्मृति की यह परिभाषा देखिए— "आर्त्तार्त्ते मुदिता हृष्टे प्रोषिता मलिना कृशा। मृते म्रियेत या पत्यौ साध्वी ज्ञेया पतिव्रता॥" अर्थात जो स्त्री पति के दुखी होने पर दुखी, सुखी होने पर प्रसन्न, पति के परदेस जा...

योगक्षेम और जोखिम

॥योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ खतरा, risk के लिए हिंदी और बहुत सी भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्द जोखम/जोखिम संस्कृत "योगक्षेम" से व्युत्पन्न है।¹ योगक्षेम > जोगखेम > जोखम > जोखिम। योगक्षेम का कोशीय अभिप्राय कल्याण, भलाई, मंगल इत्यादि है। सदियों की यात्रा के बाद जोखम तक पहुँचते-पहुँचते इसके अर्थ में परिवर्तन आ गया है। किंतु अतर्क भी तर्क का ही एक पहलू है, जोखिम में भी योगक्षेम अर्थात सुरक्षा की संभावना को ही तोला जाता है। इस प्रकार इसमें तर्कसंगति का पूर्ण अभाव नहीं कहा जा सकता।  जोखिम/जोखिम का अर्थ है ऐसा काम जिसके लिए बहुत अधिक धन-शक्ति तथा साहस की अपेक्षा हो, फिर भी जिसकी सिद्धि अनिश्चित हो। किसी कार्य या व्यापार में घाटे, अनिष्ट या हानि की संभावना जोखिम है।  भारतीय जीवन बीमा निगम का ध्येय वाक्य है– "योगक्षेमं वहाम्यहम्"  अर्थात आपका कल्याण हमारी जिम्मेदारी है। यह श्लोक भगवद्गीता का है जिसमें भगवान कृष्ण अर्जुन को कहते हैं जो लोग निरंतर मुझ में निवेश करते हैं, मैं उनकी सुरक्षा की गारंटी देता हूँ। राजस्थान में व्यापारियों के सामान के बीमा कार्य के लिए भी कहीं-कहीं...

भूस्खलन के लिए कुमाउँनी, नेपाली शब्द

कुमाउँनी "पैर पड़ण" का अर्थ पैरों पर गिरना नहीं है। भूस्खलन के लिए प्रचलित शब्द पहिरो/पइरो/पैरो (नेपाली), पैर/पैरो (कुमाउँनी) की व्युत्पत्ति संस्कृत "प्रसरः" (बढ़ना , विनाश, बाढ़) से संभव लगती है। आप्टे के अनुसार प्रसर का अर्थ भीषण तूफ़ान, तेज वर्षा, नदी का तीव्र वेग, बाढ़, विनाश आदि भी है। किंतु राल्फ़ टर्नर की व्युत्पत्ति अधिक तर्कसंगत है। उसके अनुसार पैरो (pa’irō), पैर (pa’ir) (कुमाउँनी); पऽइरो pa’irō, पहिरो pahirō (नेपाली) एक ही मूल के हैं। ~धेरै पानी परे पछि पऽइरो पऱ्यो। ~खूब पाणि पड़ीं पछिल पैरो पड़्यो। {हिम पहिरो (नेपाली.), ह्यूँ पैरो (कुमाउँनी) अर्थात् avalanche (हिमस्खलन)} टर्नर के अनुसार: कुमाउँनी/नेपाली पैरो pairo (landslip);  -- perh. < संस्कृत pradaráḥ प्रदर (प्र+दर)  fissure (गर्त) से व्युत्पन्न है। आप्टे ने 'प्रदर' का अर्थ फटना, दरार, छिद्र, गड्ढा, गर्त, विवर आदि माना है। जैसे वाल्मीकि रामायण में: "इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः प्रदरः खन्यतामिति। तस्थौ विराधमाक्रम्य कण्ठे पादेन वीर्यवान्।।" वाल्मीकि रामायण, (3.4....

नागरिकदेवो अथवा नागरिक देवो?

नागरिकदेवो भव  तैत्तिरीय उपनिषद, शिक्षावल्ली में एक महत्वपूर्ण कथन है— "मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव॥" भारतीय संस्कृति की उदात्त भावनाओं को दर्शाने वाले प्रतिनिधि कथन मानकर इन सूक्तियों का उपयोग विविध क्षेत्रों में आदर्श वाक्य के रूप में किया जाता है। इसी क्रम में और इन्हीं के अनुकरण पर एक नई अभिव्यक्ति भारतीय इतिहास में जुड़ी है– "नागरिकदेवो भव", जो प्रधानमंत्री कार्यालय के नवनिर्मित भवन पर एक आदर्श वाक्य के रूप में लिखी गई है।  कुछ सजग-सतर्क भाषा प्रेमी इस कथन की वर्तनी की शुद्धता-अशुद्धता पर विचार कर रहे हैं और इसे अशुद्ध ठहरा रहे हैं।  असल में हम जाने कब से "अतिथि देवो भव", "मातृ देवो भव" आदि पढ़ने-लिखने के अभ्यस्त हो गए हैं, जो कि हिंदी में ठीक हैं किंतु संस्कृत व्याकरण के अनुसार अशुद्ध हैं। इसलिए हमें लगता है कि नागरिकदेवो भव अशुद्ध है और शुद्ध होना चाहिए– "नागरिक देवो भव"! मातृदेव, पितृदेव, या नागरिकदेव पद बहुव्रीहि समास माने गए हैं, इसलिए इनका अर्थ है– मातृदेव: (माँ ही जिसकी देवता है ऐसा भव (...

व्युत्पत्ति न सही, उत्पत्ति ही सही...!

व्युत्पत्ति न सही, उत्पत्ति ही सही! (प्रख्यात भाषा वैज्ञानिक सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय का एक रोचक संस्मरण; सौजन्य डॉ मधु कपूर)  •••••• ऐसा हुआ है कभी कि खाना अटक जाए? फरवरी 1975 की बात है। विख्यात बंगला लेखक नारायण सान्याल की बड़ी बेटी की शादी थी। मेहमानों के भोजन की ज़िम्मेदारी कैटरर को दी गई थी। निमंत्रितों की सूची में अनेक गण्यमान्य व्यक्ति थे, जिनमें भाषाविद् सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय भी शामिल थे। अचानक खबर आई कि भाषाविद् सुनीति बाबू जल्दी आ गए हैं क्योंकि उन्हें तुरंत एक सेमिनार के लिए जाना है। उन्हें घर में बिठाकर नारायण सान्याल छत पर बिजली ग्रिल (कैटरर) के मैनेजर के पास दौड़े। "मेरे एक बहुत विशिष्ट अतिथि आ गए हैं। आप उनके लिए मुख्य व्यंजनों में से कुछ एक थाली में सजा दीजिए।" थोड़ी देर बाद मैनेजर स्वयं एक थाली में खाना सजाकर ले आए। खाते-खाते अचानक सुनीति बाबू ने एक व्यंजन की ओर इशारा करते हुए पूछा, "यह क्या है?" मैनेजर ने हँसकर कहा, "यह फिश और्ली है सर, खाइए, वेटकी मछली का स्पेशल व्यंजन है।" "फिश का क्या?" "जी, और्ली।...

आंतरिक संगम

बोलने में शब्दांशों, शब्दों या रूपिमों के बीच की ध्वन्यात्मक सीमा निकटस्थ ध्वनि से मिल जाती है। यह पाणिनीय नियमों से इतर एक प्रकार की संधि है जिसे आंतरिक संगम (इंटर्नल जंक्चर) कहा जाता है।  यह प्रकार्य प्रायः आसन्न ध्वनियों के मेल से उच्चारण परिवर्तन (संस्वनिक भिन्नता) के रूप में प्रकट होता है। उदाहरण>>   अंग्रेजी   ~ That's tough —>That stuff ~ night rate —> nitrate ~ do not know –> don't know—> dunno   हिंदी   ~ मत जा —> मज्जा ~ गया नहीं —> ग्यानी —> ज्ञानी तुम हारे —> तुम्हारे  कुमाउँनी   ~ बहू राणि —> बौराणि  बहू रानी ज्यू —> बौरानि ज्यू—> बौरन्यू ~ जाण रह् (पुल्लिंग ए.व.) —> जाणरौ आपकी भाषा/बोली में कोई उदाहरण?

हैप्पी रोज़ डे

उदास गुलाब दिवस 🌹 ••••••• हमें पता है कि यह उत्सव हमारे लिए नहीं है फिर भी जाने क्यों सुबह से गुलाब की प्रतीक्षा थी। नहीं मिलना था, नहीं मिला। गुलाब नहीं मिला तो सोचा आपसे जुलाब के बारे में ही बात क्यों न कर लें। चौंकिएगा नहीं अगर यह कहा जाए कि #गुलाब_और_जुलाब एक ही है! और गुलाब का अर्थ वह भी है जिसे हम गुलाबजल कहते हैं! 🌹🌹 अरबी भाषा में गोल/गुल का अर्थ फूल है। फ़ारसी में फूल के अतिरिक्त एक विशेष फूल 🌹 को भी गुलाब कहा गया।  आब' है पानी। तो अपने यहाँ गुल+ आब –> गुलाब से हो गया गुलाब जल। वहीं फ़ारसी में ग को ज हो जाने से गुलाब बन गया जुलाब यानी एक काढ़ा जो अपच (कॉन्स्टिपेशन) में दिया जाता है। आगे चलकर उसे काढ़े को पीकर सुबह होने वाले परिणाम के लिए भी "जुलाब" शब्द चल पड़ा। महक चाहे जैसी हो। इसी जुलाब से अंग्रेजी और कुछ यूरोपीय भाषाओँ में julep शब्द बना। बात तो बड़ी है पर अभी इतना ही। कहीं अपच न हो जाए। 🌹🌹हैप्पी रोज़ डे 🌹🌹

सा विद्या या विमुक्तये और यूजीसी का मत

सा विद्या या विमुक्तये  ••••• विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के आधिकारिक ध्येय वाक्य पर दृष्टि गई– "ज्ञान-विज्ञान विमुक्तये"।  बहुत अस्पष्ट और भ्रामक है, और व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध भी। संस्कृत में है, इसलिए कोई कुछ कहेगा भी नहीं, क्योंकि देवभाषा जो ठहरी।  जो संस्कृत नहीं जानते उनमें भी संस्कृत के स्पर्श से किसी शब्द को शुद्ध-पवित्र मान लेने की प्रवृत्ति रही है। सर्वोच्च शिक्षा की नियामक संस्था से जुड़ा हुआ है, इसलिए पाठक को मानना पड़ेगा कि ठीक ही होगा।  "ज्ञान-विज्ञान विमुक्तये" संस्कृत व्याकरण से सिद्ध नहीं होता, अर्थ भी अटपटा है– ज्ञान-विज्ञान से छुटकारा! यदि हम संस्कृत व्याकरण के अनुसार देखें, तो "ज्ञान-विज्ञान" एक समस्त पद है, जो अपने मूल रूप में है और किसी वाक्य में सीधे प्रयोग नहीं हो सकता। यदि इसे द्वन्द्व समास माना जाए, तो इसका रूप "ज्ञानविज्ञाने विमुक्तये" होना चाहिए।  यदि समास समाहार-द्वन्द्व है, अर्थात ज्ञान और विज्ञान दोनों मिलकर मुक्ति के लिए काम कर रहे हैं, तो यह रूप हो सकता है "ज्ञान-विज्ञानं विमुक्तये"।  यदि स...

भाषा गंगा को मार्ग दिखाने का भागीरथ भ्रम

//शब्द किसी भाषा में सबसे छोटी स्वतंत्र इकाई है जो भाषाओं की सीमा के आर-पार आवाजाही कर सकता है। // यह कथन हिंदी ही नहीं, विश्व की किसी भी भाषा के संदर्भ में सत्य है । शब्दों के भीतर की छेड़छाड़ उनकी आंतरिक रासायनिक व्यवस्था के लिए ठीक नहीं होगी। हिंदी के 'तद्भव' शब्द निरंतर लोक प्रयोग से घिसकर बने हैं। 'देशज' इसी मिट्टी से जन्मे हैं। अन्य अनेक भाषाओं से आगत शब्द भी दो-तीन सदियों से आम चलन में हैं और हिंदी के शब्दभंडार में समा चुके हैं। शिष्ट प्रयोग/शुद्धीकरण के नाम पर उनके स्थान पर फिर से तत्सम शब्दों को लाना या गढ़ना भाषा के विकास को उलटना है। आगत शब्दों का चलन संस्कृत में भी था। स्वयं महर्षि पाणिनि इसे स्वीकार करते हैं। आज भी हिन्दी में ही नहीं, सभी भारतीय भाषाओं में आगत शब्द प्राप्त होते हैं क्योंकि शब्दों का आदान-प्रदान जीवित भाषाओं की पहचान है।  कोई भाषा न तो विद्वानों के बनाए बनती है, न सुपठित प्रयोक्ताओं के। बहते प्रवाह को आप लाख कहें कि मेरे गाँव के निकट बहा करो, वह अपना मार्ग छोड़कर आपको भगीरथ मानकर आपके पीछे नहीं चल पड़ेगा। भगीरथ प्रयत्न करने के बाद भी आप भाषा...

सौगंध

सौगंद, सौगंध  •••••• शपथ के लिए एक हिंदी शब्द है "सौंह"।  वीरवल्ली आर जगन्नाथन ("छात्र कोश") तथा कुछ अन्य हिंदी कोश इसे "सौगंध" से व्युत्पन्न मानते हैं किंतु हमारे विचार से यह संस्कृत 'शपथ' से व्युत्पन्न होता है। संस्कृत शपथ, प्राकृत में सवहो/ सवहं हिंदी में सौंह, सौं, सूँ।  संस्कृत शब्दकोशों में सौगंध शब्द प्राप्त नहीं होता। यदि गंध से  'सु' जोड़कर किसी प्रकार (बलात्) सिद्ध कर भी लें तो गंध/सुगंध का भाव शपथ, कसम में नहीं आता। इसे समरूपी भिन्न मूलक या भ्रामक व्युत्पत्ति का शब्द मान सकते हैं। यह जानना रोचक होगा कि सौगंध चाहे राम की खाएँ या संविधान की, यह शब्द हिंदी में फ़ारसी से आया है। फ़ारसी में 'सौगंद' है, अर्थ है शपथ, क़सम। बलात् तत्समीकरण की प्रवृत्ति से ढलकर सौगंद ही सौगंध हो गया है। यह बात और है कि इसमें न गंध है, न सुगंध। संस्कृत में सौगंधिक (सुगन्ध + ठन् + अण्) या सौगन्ध्य (सुगन्धस्य भाव:) जैसे शब्द हैं जिनमें कुछ प्रत्यय जुड़ने पर वृद्धि हो जाती है। इन्हीं के अनुकरण पर हिंदी में सौगंध शब्द सौगंद के लिए गढ़ लिया गया है।

मृत्यु के उपरांत

शब्द विवेक : "मृत्योपरांत" समीक्षा  'उपरांत' शब्द संस्कृत में नहीं बनता। हिंदी का क्रियाविशेषण है जो उपरि (संस्कृत)> ऊपर (हिंदी) और अंत (संस्कृत) से मिलकर बना है, अर्थ है– के बाद, के अनंतर, तत्पश्चात। हिंदी में किसी घटना, क्रिया का संबंध उसके बाद होने वाली घटना, क्रिया से बताने के लिए योजक क्रियाविशेषण पदबंध के रूप में इसका प्रयोग होता है, और प्राय: किसी शब्द के साथ जुड़कर यौगिक शब्द भी बनाता है; जैसे –  कथा के उपरांत प्रसाद बँटेगा।  पिता के निधन के उपरांत उसकी पढ़ाई छूट गई।  कृषि भूमि के उपरांत गौचर प्रारंभ हो जाती है। उपरांत के साथ जो यौगिक शब्द बनते हैं, जैसे – तदुपरांत, स्नानोपरांत, पूजनोपरांत आदि, वे भ्रामक रूप से शुद्ध तत्सम लगते हैं, होते नहीं; क्योंकि इनका उत्तरार्ध मुख्य घटक उपरांत ही तत्सम नहीं, तद्भव है।  जन्मोपरांत, विवाहोपरांत, मरणोपरांत शब्दों का अनुकरण करते हुए अज्ञानवश 'मृत्योपरांत' भी गढ़ लिया गया है, जो असिद्ध है। मृत्यु+उपरांत (उ+उ= ऊ) —> मृत्यूपरांत होगा लेकिन हिंदी में मृत्यूपरांत का चलन नहीं है। 'मृत्यु के उपरांत' अथवा ...