"आप अच्छी-बुरी आदतों के आदी होते हैं आदि नहीं।" यह केवल एक साधारण वाक्य नहीं, बल्कि हिंदी भाषा के सौंदर्य और उसके व्याकरणिक विश्लेषण में छिपा एक गहरा जीवन-दर्शन है। अक्सर हम लिखते और बोलते समय छोटी 'इ' और बड़ी 'ई' की मात्राओं को बहुत हल्के में ले लेते हैं, लेकिन 'आदि' और 'आदी' का यह सूक्ष्म अंतर हमारे अस्तित्व के दो छोरों को परिभाषित कर देता है। इसका प्रारंभ होता है छोटी 'इ' की मात्रा वाले विशेषण 'आदि' से, जिसके मूलतः दो अर्थ हैं— किसी चीज़ का 'प्रारंभ या शुरूआत' (जैसे- आदि मानव, आदिकाल) और दूसरा किसी सूची को समेटने वाला अव्यय 'इत्यादि'। इसके ठीक उलट, जब 'द' पर बड़ी 'ई' की मात्रा जुड़ती है, तब जन्म लेता है 'आदी' जिसका सीधा संबंध इंसान के स्वभाव, उसके अभ्यास और उसकी जीती-जागती, प्रिय-अप्रिय आदतों से है। जब इस सूक्ष्म व्याकरण को ध्यान में रखकर हम मूल वाक्य को देखते हैं, तो इसकी मारक क्षमता और प्रभावोत्पादकता खुलकर सामने आती है। यह पंक्ति सीधे हमारे अस्तित्व पर चोट करती है कि एक मनुष्य के रूप ...
कुल व्यू
||वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये ||
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