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सा विद्या या विमुक्तये और यूजीसी का मत

सा विद्या या विमुक्तये 
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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के आधिकारिक ध्येय वाक्य पर दृष्टि गई– "ज्ञान-विज्ञान विमुक्तये"।  बहुत अस्पष्ट और भ्रामक है, और व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध भी। संस्कृत में है, इसलिए कोई कुछ कहेगा भी नहीं, क्योंकि देवभाषा जो ठहरी। 

जो संस्कृत नहीं जानते उनमें भी संस्कृत के स्पर्श से किसी शब्द को शुद्ध-पवित्र मान लेने की प्रवृत्ति रही है। सर्वोच्च शिक्षा की नियामक संस्था से जुड़ा हुआ है, इसलिए पाठक को मानना पड़ेगा कि ठीक ही होगा।
 "ज्ञान-विज्ञान विमुक्तये" संस्कृत व्याकरण से सिद्ध नहीं होता, अर्थ भी अटपटा है– ज्ञान-विज्ञान से छुटकारा!

यदि हम संस्कृत व्याकरण के अनुसार देखें, तो "ज्ञान-विज्ञान" एक समस्त पद है, जो अपने मूल रूप में है और किसी वाक्य में सीधे प्रयोग नहीं हो सकता। यदि इसे द्वन्द्व समास माना जाए, तो इसका रूप "ज्ञानविज्ञाने विमुक्तये" होना चाहिए। 
यदि समास समाहार-द्वन्द्व है, अर्थात ज्ञान और विज्ञान दोनों मिलकर मुक्ति के लिए काम कर रहे हैं, तो यह रूप हो सकता है "ज्ञान-विज्ञानं विमुक्तये"। 
यदि समास तत्पुरुष है, जैसे षष्ठी तत्पुरुष (ज्ञान का विज्ञान), पञ्चमी (ज्ञान से प्राप्त विज्ञान), या चतुर्थी (ज्ञान प्रदान करने वाला, ज्ञान के लिए, विज्ञान) - तो इस मामले में भी, रूप हो सकता है "ज्ञानविज्ञानं विमुक्तये"। क्योंकि मूल शब्द को पद बनाकर, कारक प्रत्यय लगाकर, ही प्रयोग किया जा सकता है।

लेकिन यूजीसी का नारा तो "ज्ञान-विज्ञान विमुक्तये" है, जिसका अर्थ कुछ अलग ही निकलता है।‌ ज्ञान-विज्ञान-विमुक्तये— यहाँ समास तत्पुरुष होगा, और पञ्चमी विभक्ति के साथ इसका अर्थ हो सकता है– "ज्ञान-विज्ञान से मुक्ति (छुटकारा पाने) के लिए" - जो यूजीसी के हाल के चर्चित क्रियाकलाप को देखते हुए उपयुक्त भी लगता है।

 "ज्ञान-विज्ञानं विमुक्तये'' ठीक है, सार्थक है। ज्ञान-विज्ञान (अज्ञान से) मुक्ति (मोक्ष) के लिए होते हैं। लेकिन समय को देखते हुए वही ठीक होगा, जो बेठीक हो! यूजीसी का ध्येय— ज्ञान विज्ञान से छुटकारा दिलाना!

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