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अपना गालीशास्त्र






प्रत्येक समाज की व्यवहार शब्दावली में गालियों का बड़ा महत्व है, समाजशास्त्र और मनोभाषाविज्ञान दोनों दृष्टियों से | अनाम-बदनाम गली-कूचों की अपनी-अपनी भाषाओं  से लेकर देवभाषा तक में गालियाँ उपस्थित हैं | हिंदी और उसकी बोलियों करें तो पंजाब, हरयाणा और गंगा तथा उसकी सहायक नदियों का संपूर्ण मैदान गालियों के लिए भी बड़ा उपजाऊ है। इस मिट्टी की उपज शेष हिंदी क्षेत्रों को भी सुलभ रहती है।

गाली वाचक मुख्यतः दो प्रकार के हैं, अर्थ या अवसर की चिंता किए बिना आदतन गाली बकने वाले (और मज़े की बात यह है कोई उनका बुरा नहीं मानता )। ये गालियाँ तकियाकलाम की तरह चलती हैं। लगता है ये निर्लिप्त होकर गालियां बाँटते हैं और प्रायः उनके घरों में ये पैतृक दाय की भांति सहेजकर रखी जाती हैं।

दूसरे प्रकार के गालीवाचक हैं आक्रोश में दूसरे को मानसिक पीड़ा पहुँचाने की नीयत से जानबूझकर गाली देने वाले | चाहें तो दूसरे प्रकार का एक उपभेद भी मान सकते  है जो फ़ेसबुक/ट्विटर/सोशल साइट्स पर धुवांधार गालियाँ बाँटते फिरते हैं।

इन्हें BK, BC, MC, KC वाली ठोस, अशिष्ट और कर्णकटु गालियों से भी कोई परहेज नहीं होता जो अंग्रेजी की “फोरलेटर कर्स वर्ड” से कई गुना अधिक वीभत्स लगती हैं | हिंदी भाषा के शब्द भंडार में ट्राॅलकर्ता ब्रिगेड के इन गालीवीरों के योगदान को कमतर नहीं आँका जा सकता है।

यों अंतरराष्ट्रीय गालीशास्त्र में ऐसा कोई विधान नहीं कि स्त्रियाँ गाली नहीं करेंगी, या कम से कम ठोस घनत्व वाली मोटी गालियों से परहेज करेंगी, फिर भी BK, BC, MC, KC वर्ग की गालियों की अपेक्षा उनसे कम ही की जाती है | एक संभ्रांत महिला ने अपनी TL पर एक मुख्यमंत्री महिला नेता के लिए  लिखा था , "उसे उसकी पार्टी के नाम से ही गाली दी जा सकती है: TMC कहकर!" एक महिला दूसरी महिला को यह गाली दे तो किसी को भी उबकाई आ सकती है, बशर्ते कुछ समझ बची हुई हो।

विचारणीय तो यह भी है कि प्रायः ऐसी सभी गालियों के केन्द्र में नारी ही क्यों रहती है ? क्या इसलिए कि पुरुष ने नारी सम्मान की कभी चिंता नहीं की ? आज शिक्षित नारी समाज भी पुरुषों की इस सनातन चाल में क्यों उलझकर रह गया है? क्या इसे नारी मुक्ति आन्दोलनों के एजेंडे में शामिल नहीं होना चाहिए ? क्या यह #मीटू से कम अपमान जनक है?

गालियाँ कभी-कभी शब्द में नहीं, भाव में होती हैं। पांडवों के दूत श्रीकृष्ण से सुयोधन कुशल पूछ रहा है
धर्मात्मजो वायुसुतश्च भीमो भ्रातार्जुनो मे त्रिदशेन्द्रसूनुः।
यमौ च तावश्विसुतौ विनीतौ सर्वे सभृत्याः कुशलोपपन्नाः॥
~दूतवाक्यम्
(धर्मराज पुत्र युधिष्ठिर, वायुपुत्र भीम, देवेंद्र पुत्र अर्जुन और अश्विनीकुमारों के पुत्र जुड़वाँ भाई सकुशल तो हैं?) 
दुर्योधन पाण्डुपुत्र चचेरे भाइयों को भाई नहीं कहता और उन्हें विभिन्न देवताओं की संतानें कहकर माँ की गाली ही दे रहा है।

और जब दूत श्रीकृष्ण पाँच ग्राम अपने "भाइयों" को देने का प्रस्ताव रखते हैं तो सुयोधन पहले दी गई छिपी हुई गाली को मानो स्पष्ट कर देता है, "वे  ठहरे देव-पुत्र, वे हम मनुष्य-पुत्रों के बांधव कैसे हो सकते हैं। बेकार ही पिष्टपेषण की बात मत करो, कहानी समाप्त।"

देवात्मजैर्मनुष्याणां कथं वा बन्धुता भवेत् ।
पिष्टपेषणमेतावत्पर्याप्तं छिद्यतां कथा॥

पीयू अर्थात् अपशब्द (गाली?)

देवताओं के लिए अपशब्द प्रयोग करने की क्रिया के लिए "देवपीयू" शब्द का प्रयोग मिलता है।
सना ता त इन्द्र नव्या आगुः सहो नभोऽविरणाय पूर्वीः।
भिनत्पुरो न भिदो अदेवीर्ननमो वधरदेवस्य पीयोः॥
ऋग्वेदे । १ । १७४ । ८ । 
(“पीयोः प्रतिकूलस्य वृत्रस्य । ” इति तद्भाष्ये सायण: ॥)


टिप्पणियाँ

  1. आपने दादा गजब ही ढा दिया । यह तो मैने आज ही देखा । अप्रत्याशित उपहार मिल गया ।
    धन्यवाद

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