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चाय पर चर्चा : उत्तराखंड की भाषाएँ


कुमाउँनी, गढ़वाली को या ऐसी ही किसी विलुप्ति की ओर बढ़ रही भाषा को जीवित रखने पर अनेक बार अनेक मंचों से बात उठाई जाती है। उसके मानकीकरण, उपयुक्त लिपि बनाने-गढ़ने की बात शायद गंभीरता से कही जाती है । गोष्ठियों में, भाषा सम्मेलनों में या अन्यत्र। तालियाँ बजती हैं, प्रस्ताव पास होते हैं और बस!

निस्संदेह किसी भी समुदाय की पहचान उसकी भाषा से शिशु-नाल संबंध से जुड़ी है। कोई भाषा मरती है तो उसे बोलने वालों की संस्कृति मरती है, उनकी पहचान ख़त्म होती है। इसलिए उसकी चिन्ता करना अपने अस्तित्व की चिंता करने जैसा ही है। सो जो लोग गढ़वाली कुमाईं जौनसारी को बचाने की चिंता कर रहे हैं, उनकी चिंता वाजिब है। लेकिन इसके लिए जो उपाय सुझाए जा रहे हैं, वे निरर्थक लगते हैं।

भाषा या लिपि गढ़ी नहीं जाती, समेटी, सहेजी और बचाई जाती है। निस्संदेह आप भाषा बना लेंगे, आत्म संतुष्टि के लिए गढ़ लेंगे, उसके वैज्ञानिक नियम लिख लेंगे किंतु यदि वह प्रचलन में ही न आए तो कितने दिन, कितने लोगों में जिएगी? यह मैं ऐसे उत्साही जनों को निरुत्साहित करने के लिए नहीं कह रहा हूँ। इतिहास गवाह है कि ऐसी आविष्कृत भाषा या लिपि चल नहीं पाई।

एस्पिरान्तो को विश्वभाषा  बनाने का सपना देखा गया। यूरोप अमेरिका के प्रायः सभी देशों का समर्थन रहा, फिर भी कोई 150 साल बाद इसे बोलने वालों की संख्या सारे विश्व मे मात्र 2 करोड़ होगी।  ख्याति प्राप्त भाषावैज्ञानिकों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फ़ोनेटिक लिपि पर काम किया, फिर भी शायद दो-चार ही मिल पाएँगे जो इसका उपयोग करते हैं! हिंदी में नागरी को सुधारने के अनेक उपाय हुए। छुटपुट प्रयासों की चर्चा न भी करें तो बड़ी पहलों में पहले काका कालेलकर की और बाद में आचार्य नरेन्द्रदेव की बात मानते हुए पुस्तकें भी छपीं। चली नहीं। और छोड़िए, भारत सरकार के द्वारा औपचारिक रूप से समर्थित मानक हिंदी को स्वीकारने वाले ही कितने हैं?

इसलिए मित्रो, दो टूक बात यह है कि भाषा या लिपि बदलने-सुधारने की बात चाय गोष्ठियों तक ही ठीक है, अच्छी लगती है; परंतु न व्यावहारिक है, न उपयोगी। यदि इन उत्तराखंडी भाषाओं को विलुप्त होने से बचाना चाहते हैं तो कम से कम इन दो कामों से शुरू कीजिए:
1. अपने घरों में, परस्पर व्यवहार में अपनी भाषा का प्रयोग कीजिए।
2. प्रत्येक प्राथमिक विद्यालय में, पब्लिक हो या सरकारी, शिक्षा का माध्यम अपनी  भाषा को बनवाइए।
यह हुआ तो भाषाएं जिएंगी, वरना तो भविष्य डरावना है ही.
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प्रसंगवश मानकीकरण की बात संक्षेप में। यह बात तब उठती है जब भाषा का मौखिक और लिखित रूप में पर्याप्त प्रयोग हो रहा हो। संस्कृत के मानकीकरण का श्रेय यदि आचार्य पाणिनि को देते हैं तो यह भी ध्यान में रखें कि पाणिनि से पूर्व हज़ारों वर्षों से वह प्रयोग में थी। बच्चा बढ़े तो डिज़ाइनर सूट पहन लेगा। अभी लोगों को लिखने दीजिए। उसका प्रवाह होगा तो कूल-किनारे तय हो जाएँगे। 

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