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एकाबखत और हबीक


कुमाऊँ में श्राद्ध कर्म से संबंधित दो शब्द लोक प्रचलित हैं- 'एकाबखत' और 'हबीख'। परंपरानुसार श्राद्ध से पहले दिन श्राद्धकर्ता और उसकी पत्नी एक बार ही भोजन करते हैं। उस दिन के लिए लोकप्रसिद्ध नाम है- 'एकाबखत'। व्युत्पत्ति इस प्रकार होगी- एक + अभुक्त > एकाभुक्त > एकाबखत ( = एक समय भोजन न करना)। अथवा एक भुक्त (एक बार भोजन करना)।
एकाबखत का 'बखत' फ़ारसी से आया हुआ अरबी मूल का 'वक़्त' भी हो सकता है- एक वक़्त > एक बखत> एकाबखत ( = एकबार)। इस उत्पत्ति पर भी शंका नहीं की जानी चाहिए क्योंकि कुमाउँनी में सैकड़ों शब्द फ़ारसी मूल के हैं और आम व्यवहार में हैं। लोक व्यवहार में भी एकाबखत का प्रयोग फ़ारसी मूल को ही संकेतित करता है। कुमाउँनी में कहा जाएगा- "एकाबखताक् दिन खाण् एक्कै बखत खानी, बखत बखत नि खान्।" (एकाबखत के दिन खाना एक ही बखत खाते हैं, बखत बखत नहीं खाते।)!
'हबीक' शब्द वैदिक काल का है और उस भोजन से संबंधित है जो एकाबखत के दिन किया जाता है। हबीक बना है 'हविष्य' से। 'हवि' अर्थात हवनीयद्रव्य, घृत, घी-भात, कोई पवित्र भोज्य पदार्थ जिसकी अग्नि को आहुति दी जा सके, निरामिष , शाकाहारी भोजन। जिसका नैवेद्य निवेदित किया जा सके। "घृतपक्वं हविष्यं च पायसं वा सशर्करम्"।
 अगस्त्यसंहिता के अनुसार ये फलाहार भी हविष्य में हैं 
नारिकेलफलञ्चैव कदलीं लवलीं तथा।
आम्रमामलकञ्चैव पनसञ्च हरीतकीम् । प्रतान्तरप्रशस्तञ्च हविष्यं मन्वते बुधाः।  
'हविष्य' से बना हबिक्ख, हबिक्ख से हबीख > हबीक।

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