सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

भिनसार से बिनसर

निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। 
लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा ॥

'भा' का अर्थ है प्रकाश, चमक। वि+भा विभा, अर्थात विशेष चमक। सुबह-सुबह सूर्य उदय से पूर्व रात्रि समाप्त होने की सूचक प्रकाश की पहली रेखा जब पूर्वी क्षितिज पर दिखाई पड़ती है तो उसे कहा गया है विभान > विहान। विभान से बिहान, बियान (रात्तिबियाण कुमाउँनी में)। दूसरे शब्दों में क्षितिज से प्रातः कालीन विभा का निस्सरण, निस्सार (निकलना) कहा जाएगा विभानिस्सार। विभा (प्रकाश) निस्सार (निकलना) > भिनसार, भिनुसार । 

विभिन्न अंचलों में तड़के-तड़के, मुँह-अँधेरे, बहुत सवेरे, अलसुबह, भिनसारे, भिंसुरें, फजीरे (अरबी फ़ज़्र/फ़ज़र से फजीरे), भोरे, भोरहरे आदि इसी भोर बेला के लोक प्रचलित नाम हैं। प्रातःकाल, ब्राह्म मुहूर्त जैसे संस्कृत शब्द लोक में प्रयुक्त नहीं होते।

अल्मोड़ा के निकट एक बहुत सुंदर पर्यटन स्थल है- 'बिनसर' जो आसपास की पर्वत श्रेणियों से अधिक ऊँचाई पर स्थित है। इसलिए बिनसर पहाड़ी पर उगते सूर्य की विभा सबसे पहले दिखाई पड़ती है। इसलिए कह सकते हैं कि 'भिनसार' से बना बिनसर।
 पौड़ी में भी अल-सुबह के लिए बिंसरि सुना था। बिनसर महादेव मंदिर अनेक स्थानों में हैं।
एक मित्र के अनुसार लोक भाषाओं के ये सुंदर शब्द शिक्षित वर्ग को गँवार शब्द लगते हैं, इसलिए अपने बच्चों को नहीं सिखाते। 
झुटपुटे की ये पहचानें भी कहीं-कहीं हैं -
ब्राह्म मुहूर्त - जुनहिया ऊएँ
थोडा़ थोडा़ अन्धकार- भुकभुके
दृष्टिसीमा के आधे तक दिखाई देना - मकाखोरा
दृष्टिसीमा तक धुँधला दिखना- भुनसारा
©

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

धोबी का कुत्ता

किन्हीं सज्जन की एक फ़ेसबुक पोस्ट पर ट्विटर और फ़ेसबुक पर बड़ी रोचक चर्चा हुई जिसमें कहा गया है कि "धोबी का कुत्ता घर का न घाट का" कहावत में कुत्ता नहीं, "कुतका" का प्रयोग सही है।  यह लोकोक्ति सदियों से ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी, बुंदेली, नेपाली, कुमाउँनी सहित अनेक अन्य भाषाओं में बहुत पहले से उपस्थित है। 15-वीं सदी के संत कवि गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली में इसका प्रयोग मिलता है। इसका आशय ऐसे व्यक्ति से है जो एक ठिकाने पर जमकर कोई काम नहीं करता । बेकार उधर फिरनेवाला । निकम्मा आदमी। कहावत का कुत्ता घर का इसलिए नहीं कि आमतौर पर कुत्ते का काम होता है घर की रखवाली करना। जब घाट पर जाएगा, तो रखवाली कौन करेगा। घाट का इसलिए नहीं कि वहाँ उसके करने का कोई काम नहीं और आखिर वहाँ से भी धोबी के साथ लौट ही आएगा।  इस लोकोक्ति का एक छोटा रूप भी हिन्दी में चलता है - घर का न घाट का। अंग्रेजी में इसके समकक्ष कहावत है:  Whistling maids and crowning hen, are neither fit for gods, nor for men!  "कुतका" हिन्दी में एक बैटनुमा मोटा डंडा या सोंटा है जो कपड़े को धोने के दौरा...

राजनीतिक और राजनैतिक

शब्द-विवेक : राजनीतिक या राजनैतिक वस्तुतः राजनीति के शब्दकोशीय अर्थ हैं राज्य, राजा या प्रशासन से संबंधित नीति। अब चूँकि आज राजा जैसी कोई संकल्पना नहीं रही, इसलिए इसका सीधा अर्थ हुआ राज्य प्रशासन से संबंधित नीति, नियम व्यवस्था या चलन। आज बदलते समय में राजनीति शब्द में अर्थापकर्ष भी देखा जा सकता है। जैसे: 1. मुझसे राजनीति मत खेलो। 2. खिलाड़ियों के चयन में राजनीति साफ दिखाई पड़ती है। 3. राजनीति में कोई किसी का नहीं होता। 4. राजनीति में सीधे-सच्चे आदमी का क्या काम। उपर्युक्त प्रकार के वाक्यों में राजनीति छल, कपट, चालाकी, धूर्तता, धोखाधड़ी के निकट बैठती है और नैतिकता से उसका दूर का संबंध भी नहीं दिखाई पड़ता। जब आप कहते हैं कि आप राजनीति से दूर रहना चाहते हैं तो आपका आशय यही होता है कि आप ऐसे किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहते जो आपके लिए आगे चलकर कटु अनुभवों का आधार बने। इस प्रकार की अनेक अर्थ-छवियां शब्दकोशीय राजनीति में नहीं हैं, व्यावहारिक राजनीति में स्पष्ट हैं। व्याकरण के अनुसार शब्द रचना की दृष्टि से देखें। नीति के साथ विशेषण बनाने वाले -इक (सं ठक्) प्रत्यय पहले जोड़ लें तो शब्द बनेगा नै...

गधा (गर्दभ)

गधा संस्कृत में एक धातु है √गर्द (शोर करना, चीखना-चिल्लाना) उससे अभच् प्रत्यय जुड़कर बनता है गर्दभ। गर्दभ > गधा (गदहा)। एक सीधा-सादा पशु, donkey, ass. लाक्षणिक अर्थ: मूर्ख, भोला, simpleton, stupid. अविश्रामं वहेद्भारं शीतोष्णञ्च न विन्दति ससन्तोषस्तथा नित्यं त्रीणि शिक्षेत गर्दभात्॥ ~चाणक्य "बिना विश्राम किए भार वहन करना, सर्दी-गर्मी की चिंता न करना, सदा संतुष्ट रहना, ये तीन बातें गधे से सीखनी चाहिए।" गधे अनुशासित होते हैं और अपने काम को लेकर बहुत सजग रहते हैं। गधों की याददाश्त बहुत अच्छी होती है, वे रास्तों को आसानी से याद रख सकते हैं। कहते हैं कि रेखागणित का एक प्रमेय गर्दभानंद ने सिद्ध किया था — त्रिभुज की दो भुजाओं से तीसरी छोटी होती है। [चित्र कच्छी गधा (गुजरात), सौजन्य @विकी कॉमंस] गुजरात में दो विशिष्ट नस्लों के गधे मिलते हैं - हलारी गधा और कच्छी गधा। दोनों ही नस्लें गुजरात के पारंपरिक पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनके संरक्षण के लिए विशेष  उपाय किए जा रहे हैं। 🫏🫏🫏