व्युत्पत्ति न सही, उत्पत्ति ही सही!
(प्रख्यात भाषा वैज्ञानिक सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय का एक रोचक संस्मरण; सौजन्य डॉ मधु कपूर)
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ऐसा हुआ है कभी कि खाना अटक जाए?
फरवरी 1975 की बात है। विख्यात बंगला लेखक नारायण सान्याल की बड़ी बेटी की शादी थी। मेहमानों के भोजन की ज़िम्मेदारी कैटरर को दी गई थी। निमंत्रितों की सूची में अनेक गण्यमान्य व्यक्ति थे, जिनमें भाषाविद् सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय भी शामिल थे। अचानक खबर आई कि भाषाविद् सुनीति बाबू जल्दी आ गए हैं क्योंकि उन्हें तुरंत एक सेमिनार के लिए जाना है। उन्हें घर में बिठाकर नारायण सान्याल छत पर बिजली ग्रिल (कैटरर) के मैनेजर के पास दौड़े।
"मेरे एक बहुत विशिष्ट अतिथि आ गए हैं। आप उनके लिए मुख्य व्यंजनों में से कुछ एक थाली में सजा दीजिए।"
थोड़ी देर बाद मैनेजर स्वयं एक थाली में खाना सजाकर ले आए। खाते-खाते अचानक सुनीति बाबू ने एक व्यंजन की ओर इशारा करते हुए पूछा, "यह क्या है?"
मैनेजर ने हँसकर कहा, "यह फिश और्ली है सर, खाइए, वेटकी मछली का स्पेशल व्यंजन है।"
"फिश का क्या?"
"जी, और्ली।"
सुनीति बाबू ने चबाना बंद कर दिया और सीधे तनकर बैठ गए।
"फिश और्ली का मतलब क्या? यह किस देश का खाना है?"
"वेटकी मछली का फिश और्ली, सर! यानी और्ली।"
"इसका स्पेलिंग क्या है?"
सूट पहने मैनेजर ने अपनी टाई ढीली करते हुए हकलाते हुए कहा, "O-R-L-ई, रेफ के साथ लंबा ई, सर!"
सुनीति बाबू ने गंभीरता से कहा, "मैं रोमन स्पेलिंग पूछ रहा हूँ।"
मैनेजर ने अब हार मानते हुए कहा, "पक्का नहीं पता। सुना है जर्मन, नहीं, शायद फ्रेंच।"
सुनीति बाबू ने हाथ समेट लिया और बोले, "नहीं, जर्मन में तलने को Gebacken या Gebraten कहते हैं। फ्रेंच में तली मछली को Frit Poissons कहते हैं। और्ली तो जर्मन या फ्रेंच खाद्य सूची में नहीं है। स्पैनिश में तली मछली को Frito Pescado कहते हैं, इतालवी में Fritte Pesce. यह और्ली कहाँ से आया?"
खाना सिर पर चढ़ गया। समझ आया कि और्ली की व्युत्पत्ति पता न चली तो बात अटक जाएगी। मेजबान नारायण बाबू असहाय खड़े थे। अचानक उनके मँझले भाई ने कहा, "जी, अभी के लिए तो इतना मान लीजिए कि यह रसोई से आया है। सिर्फ तली मछली समझिए। व्युत्पत्ति न सही, उत्पत्ति का तो पता चल गया।"
सुनीति बाबू हँस पड़े। "तो कहिए न, तली मछली, और्ली नहीं। तब तो खाया जा सकता है। और्ली का कुछ पता नहीं, लेकिन तली मछली को उलट-पुलट कर खाना मुझे आता है।"
बाद में ग्रिल के मैनेजर ने नारायण बाबू से पूछा, "वह कौन थे, सर?"
"हमारे राष्ट्रीय प्रोफेसर सुनीति बाबू, बहुत प्रख्यात भाषाविद्।"
मैनेजर ने पूछा, "और कितने भाषाविद् आपकी अतिथि सूची में हैं?"
नारायण बाबू ने कहा, "और कोई नहीं। आप निश्चिंत होकर फिश और्ली चला सकते हैं।"
मैनेजर ने हँसकर कहा, "अब डर कैसा? व्युत्पत्ति न सही, उत्पत्ति तो पता चल गई—रसोई!"
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