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उत्तराखंड के कुछ तीर्थ नाम जो व्याकरण सिद्ध नहीं, लोक सिद्ध हैं

भाषा के मामले में एक सिद्धांत यह भी है कि जो लोक मान ले, वही शुद्ध। लोकमान्यता का अर्थ यह नहीं है कि मैं आज एक शब्द बना लूँ और कल लोग उसे मानने लगें। लोकमान्यता में सैकड़ों वर्ष लग सकते हैं।
व्युत्पत्ति या व्याकरण की दृष्टि से उत्तराखंड के ये पवित्र तीर्थ-नाम अशुद्ध हैं, लेकिन अब लोक स्वीकृत हैं–


गंगोत्री/गंगोत्तरी – इनका न तो उत्तर-दक्षिण से कुछ लेना-देना है, न उत्तरीय वस्त्र से। पौराणिक कथा के अनुसार गंगा (भागीरथी) का शिव की जटाओं से भूमि पर उतरना है "गंगावतरण।" जिस स्थान पर गंगा का अवतरण हुआ वह गंगावतरणी। गंगावतरणी से> गंगावतरी> गंगोत्तरी> गंगोत्री। लोक ने अवतरी को "उतरी"  मानकर पुनः संधि पद बना दिया – गंगा + उतरी= गंगोतरी। व्याकरण में यह संधि संभव नहीं, लोक का अपना तर्क होता है।

 
यमुनोत्री/यमुनोत्तरी को सीधे ही गंगोत्री/गंगोत्तरी के अनुकरण पर बना लिया गया है और उसी की भाँति सौ टका शुद्ध माना जाता है।


बद्रीनाथ – बदर, बदरी बेर के फल को कहा जाता है। एक पुराण कथा के अनुसार भगवान विष्णु यहाँ बदरी वन, बद्रिकाश्रम में तपस्या में लीन थे तो उन्हें हिमपात से बचाने के लिए लक्ष्मी ने स्वयं एक बेर का पेड़ बनकर उनके ऊपर छाया की और इस प्रकार उनकी सहायता की। तप पूर्ण होने पर नारायण ने कहा कि हम से पहले तुम्हारा नाम लिया जाएगा। इसलिए स्थान हो गया बदरी-नारायण। आगे चलकर हिमालय क्षेत्र के अधिकतर शिव या विष्णु मंदिरों के साथ "नाथ" जुड़ने लगा तो बदरीनाथ> बद्रीनाथ।


ऋषिकेश – भ्रामक व्युत्पत्ति के अनुसार इस स्थान का संबंध किसी ऋषि/महर्षि के केशों से जोड़ा जाता है जो तर्कसंगत नहीं है।


 ऋषिकेश लोकव्युत्पत्ति का अनूठा उदाहरण है, लगता शुद्ध तत्सम है, पर है नहीं। ऋषि और केश दोनों से इसका लेना-देना नहीं। यह है हृषीकेश (हृषीक + ईश = ज्ञानेन्द्रियों का स्वामी) विष्णु का एक नाम।
"हृषीकाणीन्द्रियाण्याहुस्तेषामीशो यतो भवान्।
हृषीकेशस्ततो विष्णु: …   …"
आदि ह बोलने में कुछ कठिनाई हुई तो मुख सुख के लिए हृषीकेश से ऋषिकेश बना लिया गया।


सहस्त्रधारा– सहस्रधारा उच्चारण दोष से 'सहस्त्रधारा' हो गया है। लगता है नगर निगम देहरादून ने सहस्रधारा को सहस्त्रधारा लिख-लिखकर नया शब्द अधिक प्रचलित कर डाला है। सारे नामपट, मार्गदर्शक संकेत इसी अशुद्ध नाम से लिखे मिलते हैं।
अनेक जल धाराएँ होने के कारण इसे सहस्र (हजार) धारा (प्राकृतिक प्रवाह) कहा गया। सहस्त्र कोई शब्द ही नहीं है।

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https://thefollowup.in/news/-rishikesh-was-named-after-lord-vishnu--named-hrishikesh-4185.html
https://vagarth.blogspot.com/2025/01/blog-post.html?m=1

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