मस और मूँछ दोनों का मूल एक है– संस्कृत में श्मश्रु, प्राकृत में मस्सू।
किशोरावस्था में लड़कों में कुछ शारीरिक परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं। इनमें एक है नाक के नीचे ऊपरी होंठ पर उगती रोमावली - मसें। मसें भीगना एक मुहावरा है। लड़कों के जब मूँछों वाली पहली रोमावली आती है तो उसे मस कहते हैं। मसें भीगना मुहावरा है, अर्थ है युवावस्था की दहलीज़ पर होना। एक ओर श्मश्रु के प्राकृत रूप मस्सु से मस बना है, तो दूसरी ओर श्मश्रु से > मच्छु > मुच्छ > मूँछ।
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इरफान साहब ने कभी X- मोहल्ले में पूछा था —
"बाछें कहाँ हैं और वे कैसे खिलती होंगीं?"
नाचीज़ ने कुछ यूँ अर्ज़ किया था:
बाँछें हम सबके होती हैं। हमारे मुँह के दोनों सिरे (कोरें), जहाँ दोनों होंठ मिलते हैं, उन्हें बाँछें कहा जाता है। जब हम भीतर से प्रसन्न होते हैं तो वह प्रसन्नता मुस्कान के साथ बाँछों में व्यक्त होती है, और बाँछें खिलती हैं। हर मर्ज़ की दवा और हर शब्द की जड़ संस्कृत में ढूँढ़ने वाले कुछ लोग इसका मूल वांछा (इच्छा) से मानते हैं। 'हिंदी शब्द सागर' भी बाँछ को देशज शब्द मानता है और अर्थ देता है होठों की कोर!
[नखलऊ वालों का 'जर्नल नालेज' इस मामले में थोड़ा कमज़ोर बताया जाता है। देखिए न, "राग दरबारी" वाले सुकुल जी भी जिस्म में बाँछों के स्थान को लेकर पर्याप्त सशंकित थे।]
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