भाषाविज्ञान में, अतिशोधन (हाइपरकरेक्शन) एक ऐसी त्रुटि है, जिससे कोई वक्ता या लेखक, किसी रूप को सही या अधिक प्रतिष्ठित भाषा के रूप में समझते हैं और उसे प्रतिस्थापित करते हैं। कथित शुद्ध रूप का उपयोग करने के प्रयास में, किसी नियम को अधिक होशियारी से किंतु गलत तरीके से लागू करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक गलत रूप चल पड़ता है ।
भाषिक अतिशोधन के दो प्रमुख कारण हैं– अति सतर्कता और उस नियम विशेष का अज्ञान। अर्थात् एक वास्तविक या काल्पनिक वैयाकरणिक नियम को अनुपयुक्त संदर्भ में लागू किया जाता है, जिससे "सही" करने के प्रयास में गलत परिणाम सामने आते हैं।
अतिशोधन के उदाहरण सभी भाषाओं में मिल सकते हैं, हिंदी में भी।
शुभेच्छा के लिए 'शुभेक्षा', छात्र जीवन के लिए क्षात्र जीवन, क्योंकि अज्ञान-जन्य भ्रम से /क्ष/ और /छ/ को अभिन्न या परस्पर स्थानापन्न मान लिया जाता है।
एक उदाहरण वैष्णोदेवी के यात्रा मार्ग में कटरा और भवन के बीच स्थित एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पड़ाव मिलता है, जो कभी-कभी समाचारों में भी दिखाई पड़ जाता है। नाम कुछ पुराना है– अधकुँवारी। किसी से भी उसका अर्थ पूछिए तो सीधा उत्तर मिलेगा– अधकुँवारी अर्थात अर्धकुमारी! अब थोड़ा सोचिए। कुमारी शब्द को तो आप जानते हैं; अर्ध (आधा) को भी जानते हैं। शब्द के दोनों घटकों को जानते हैं तो बताइए अर्धकुमारी क्या होता है?
कुमारी दस वर्ष से बारह वर्ष तक की अवस्था की अविवाहिता कन्या को कहा जाता था। वह किशोरी, जिसका कौमार्य अक्षत हो। कालांतर में किसी भी अविवाहित नारी के लिए नाम से पहले कुमारी विशेषण प्रयुक्त किया जाने लगा। शब्दार्थ की दृष्टि से अर्धकुमारी उसको कहेंगे जो जिसने अपना आधा कौमार्य बचा लिया है!
यह बड़ी हास्यास्पद बात है।
दरअसल मूल नाम है– 'आदक्वाँरी,' जिसे आदिकुमारी (आद्या कुमारी) से बना माना जा सकता है। आदक्वाँरी से अदक्वाँरी और फिर अधक्वारी। शुद्धतावादियों ने पुनः संस्कृत के स्पर्श से अतिशोधन किया और परिणाम स्वरूप बन गया– 'अर्धकुमारी'।
ध्यान रखिए बिना सोचे-समझे संस्कृतीकरण करने से असंस्कृत शब्द भी बन सकते हैं!
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