"आप अच्छी-बुरी आदतों के आदी होते हैं आदि नहीं।"
यह केवल एक साधारण वाक्य नहीं, बल्कि हिंदी भाषा के सौंदर्य और उसके व्याकरणिक विश्लेषण में छिपा एक गहरा जीवन-दर्शन है। अक्सर हम लिखते और बोलते समय छोटी 'इ' और बड़ी 'ई' की मात्राओं को बहुत हल्के में ले लेते हैं, लेकिन 'आदि' और 'आदी' का यह सूक्ष्म अंतर हमारे अस्तित्व के दो छोरों को परिभाषित कर देता है। इसका प्रारंभ होता है छोटी 'इ' की मात्रा वाले विशेषण 'आदि' से, जिसके मूलतः दो अर्थ हैं— किसी चीज़ का 'प्रारंभ या शुरूआत' (जैसे- आदि मानव, आदिकाल) और दूसरा किसी सूची को समेटने वाला अव्यय 'इत्यादि'। इसके ठीक उलट, जब 'द' पर बड़ी 'ई' की मात्रा जुड़ती है, तब जन्म लेता है 'आदी' जिसका सीधा संबंध इंसान के स्वभाव, उसके अभ्यास और उसकी जीती-जागती, प्रिय-अप्रिय आदतों से है।
जब इस सूक्ष्म व्याकरण को ध्यान में रखकर हम मूल वाक्य को देखते हैं, तो इसकी मारक क्षमता और प्रभावोत्पादकता खुलकर सामने आती है। यह पंक्ति सीधे हमारे अस्तित्व पर चोट करती है कि एक मनुष्य के रूप में आप अपनी अच्छी या बुरी आदतों के गुलाम या अभ्यस्त (आदी) तो हो सकते हैं; लेकिन आपका जीवन न तो किसी कहानी की 'शुरुआत' बताने वाली संज्ञा (आदि) है और न ही किसी बेजान सूची के अंत में उपेक्षा से फेंका गया कोई अव्यय 'इत्यादि' (आदि)।
दार्शनिक रूप से देखें तो यह वाक्य हमारी नियति का भी निर्णय करता दिखाई देता है। जो मनुष्य अपनी चेतना को मारकर केवल आदतों का आदी (विशेषण ) बनकर रह जाता है, वह अंततः अपने ही जीवन के रंगमंच पर एक मुख्य कलाकार से घटकर जैसे एक वस्तु सूची मात्र बन जाता है, जो 'आदि' से पूरी मान ली जाती है।
व्याकरण की यह चूक वास्तव में एक आत्मिक भूल भी है—यह हमें चेताती है कि यदि हमने अपनी आदतों पर नियंत्रण नहीं रखा, तो हम इस अनंत ब्रह्मांड में एक पूर्ण, जीवित नायक बनने के बजाय अपने आप को अपने ही जीवन की पटकथा के किसी धुँधले कोने में 'इत्यादि' की तरह उपेक्षित और कतार में सबसे पीछे खड़ा पाएँगे। इसलिए निश्चय हमको करना है कि हम अपनी आदतों के सजग आदी बनकर खुद को निखारते हैं, या अपनी अस्मिता खोकर किसी आदत के आदी हो जाते हैं, किसी नवीन विचार के आदि स्रोत नहीं!
उक्त वाक्य में छिपा व्यंग्य भी कम दिलचस्प नहीं है। आदतें मनुष्य के व्यक्तित्व को गढ़ती हैं, लेकिन जब वही आदतें उस पर हावी हो जाती हैं, तो उसकी स्वतंत्र सोच और विवेक प्रभावित होने लगते हैं। अच्छी आदतें जीवन को सँवारती हैं, जबकि बुरी आदतें धीरे-धीरे उसकी स्वतंत्रता को सीमित कर सकती हैं। इसलिए आदतों का होना स्वाभाविक है, लेकिन उनका गुलाम हो जाना विवेक के अभाव का सूचक है।
भाषा की दृष्टि से देखें तो छोटी ‘इ’ और बड़ी ‘ई’ की यह मामूली-सी मात्रा अर्थ की दो अलग दिशाएँ खोल देती है। एक ओर ‘आदि’ है, जो किसी आरंभ या सूची के विस्तार का संकेत देता है; दूसरी ओर ‘आदी’ है, जो मनुष्य के व्यवहार और उसकी आदतों से जुड़ा है। यही हिंदी की अभिव्यक्ति का सौंदर्य है कि एक छोटी-सी मात्रा भी विचारों की पूरी दिशा बदल सकती है।
और अंत में, भाषा के साधको! बात केवल मात्रा की नहीं, अपनी अस्मिता की भी है। अच्छी आदतों के आदी बनिए, बुरी आदतों से बचिए; लेकिन अपनी पहचान को आदतों के हवाले मत कीजिए। जीवन की पटकथा में अपनी भूमिका स्वयं तय कीजिए। कहीं ऐसा न हो कि आप अपनी आदतों के आदी होते-होते अपने ही जीवन में केवल ‘आदि’ यानी इत्यादि बनकर रह जाएँ!
साधो! शब्द विचारो—कभी-कभी एक मात्रा का अंतर ही मनुष्य को अपनी आदतों का स्वामी और दास होने के बीच का फर्क समझा देता है।
का आदि बन जाना स्वीकार करते हैं।
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