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कविराज और वैद्यराज

 


कवि शब्द संस्कृत की √कु धातु से बना है। अदादि गण, परस्मैपदी कु के अनेक अर्थों में हैं कूजना, गूँजना, मधुर स्वर करना। कु से इ प्रत्यय जोड़कर निष्पन्न होता है कवि। प्रयोग की दृष्टि से कवि अनेक आयामी है। सर्वज्ञ, प्रतिभाशाली,  विचारवान, बुद्धिमान, विचारक, ऋषि, कविता रचने वाला, प्रशंसनीय आदि इसके अर्थ हैं। सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु, शुक्राचार्य, वाल्मीकि को भी कवि कहा गया है।


कवि शब्द के साथ जो प्रमुख अर्थ बिंब बनता है उसमें प्रधान है कोई रचनाकार, जो काव्य रचना करता हो। संस्कृत में तो कवि सब प्रकार के रचना कर्मियों को कहा गया है चाहे वह कविता, नाटक, कहानी, गल्प,  निबंध कुछ भी लिखता हो। दूसरी ओर भगवान विष्णु को भी कवि कहा गया है । प्रबुद्ध, मनीषी, विचारवान भी कवि हैं। उपनिषद के कथनानुसार कवि का एक अर्थ विद्वान भी है। यथा- "...क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयो वदन्ति।"(कठोपनिषद्) किसी ने तो यह भी कह दिया के कवि अनुशासन या नियमों के अंकुश के परे होते हैं- "निरंकुशा हि कवयः।"

जो हो, किंतु मेरी समस्या यह है कि आयुर्वेद के विशेषज्ञों को "कविराज" क्यों कहा जाता है? यह मैं ईर्ष्या, द्वेष या दोष-दर्शन की प्रवृत्ति से नहीं कह रहा, शुद्ध भाषिक जिज्ञासा से पूछ रहा हूँ। शब्दकोश में कहीं भी कवि का अर्थ वैद्य या चिकित्सक नहीं मिला। धन्वंतरि या सुषेण जैसे चिकित्सकों को भी वैद्यराज ही कहा गया है।

कुछ विचार के बाद  समाधान यह निकला के कवि का अर्थ केवल काव्य रचना करने वाला ही नहीं, सुविज्ञ, विचारवान, चतुर, अतींद्रिय विषयों को जानने वाला भी है। वैद्य के लिए कविराज का प्रयोग संभवतः कवि शब्द में अर्थ विस्तार से होने लगा होगा क्योंकि रोगों के बारे में जानना, उनका निदान और चिकित्सा करना सबके बस का नहीं होता। यह भी उस युग में जब आज की तरह उच्चतम कोटि के के नैदानिक उपकरणों का सर्वथा अभाव था। यह कोई ऐसा व्यक्ति ही कर सकता है जिसे सामान्य इंद्रियों के परे देखने-समझने की शक्ति भी प्राप्त हो। इसलिए आश्चर्य नहीं कि वैद्यराज आगे चलकर कविराज कहलाए। 

अपनी कविताई से राजाओं के गुण गाने वाले चारण, विरुदावली वर्णन करने वाले भाट भी कविराय, कविराज कहलाए। वीरगाथा काल में ऐसे कुछ कविराज रासौकार भी हुए। आगे चलकर इन कविराजों को वीर रस के स्थान पर शृंगार की कविताई करनी पड़ी क्योंकि राजाओं को युद्ध की नहीं, अपनी प्रेमिकाओं और पत्नियों के समक्ष दूसरी प्रवृत्ति के युद्ध करने होते थे। निदान शृंगारी कविराज के साथ--साथ दरबारों में बैदकी वाले कविराज भी आवश्यक हो गए क्योंकि क्षीण बल राजाओं को विरुद वर्णन वाली कविताई से जोश की आवश्यकता नहीं रह गई थी। मदन बल तभी मिल सकता था जब श्रेष्ठ रस - रसायनों से निर्मित ओषधियाँ मिलती रहें। यह काम बैद जी अर्थात कविराज का होता था। जैसे काव्यरूपी शरीर में अलंकारादि से रस की सृष्टि करनेवाले "कविराज" कहे गए, ठीक वैसे ही अस्थि-चर्ममय शरीर में औषधीय- रसायनादि से "रस" का संचार करनेवाले चिकित्सक ( वैद्य ) भी। इसे कुछ यों भी कहा जा सकता है कि राजाओं के कान में दरबारी  कविराज और बदन में वैद्यनाथ कविराज मदन और मकरध्वज का इंजेक्शन लगाते थे ।

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अब यह आवश्यक नहीं कि आप मेरी बात से सहमत हों, लेकिन आप अपनी बात सामने रखिए तो सही।

टिप्पणियाँ

  1. सुना है,यह कि आयुर्वेदज्ञ कविराज उपाधि धारण करते रहे हैं, अभी कोई प्रमाण इस सन्दर्भ में उपलब्ध नहीं है।

    पुनरपि अनुमान किया जा सकता है कि सृष्टि में सृजन-कर्त्ता का कुछ साधर्म्य चिकित्सा करने वाले के हाथों में भी होता है... यजुर्वेद (४०.८) में ईश्वर को 'कवि:' कहा गया है, "कविर्मनीषी परिभू: स्वयम्भू:" , एक अन्य स्थान पर "भेषजं कविम्" ...(२८.३४)... यद्यपि यह केवलमात्र साम्य है,हो सकता है कविराज कहना पारम्परिक हो...

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  2. मतलब यह कि वैद्यराज के लिए कविराज का भी प्रयोग होता है।

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