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नल और बंबा

 


बम्बा - कथा


पुराण कथाओं में  निषध देश के  विख्यात  राजा नल  को  अगर थोड़ी देर के लिए भूल जाएँ  तो संस्कृत में "नल" शब्द नरकुल घास के लिए प्रयुक्त हुआ है। इसी नरकुल से लेखनी बनाई जाती थी जिसका उपयोग लगभग सौ वर्ष पहले तक खूब होता रहा है। शहनाई आदि कुछ सुषिर वाद्यों की फूंक मारने वाली नलकी (पींपनी) भी इसी नरकुल से बनती थी। नरकुल घास की विशेषता है की इसके छोटे से तने के टुकड़े भीतर से पोले होते हैं। इस पोलेपन को लेकर ही आगे चलकर धातु या काष्ठ के बने ऐसे टुकड़े को भी नल/नाली कहा जाने लगा जो भीतर से पोले बनाए जाते थे और फूँकने या पानी आदि के लिए प्रयुक्त होते थे। आगे चलकर इनका व्यापक उपयोग जलवहन में होने लगा। अर्थ विस्तार हुआ और यह पानी के अर्थ में भी प्रयुक्त होने लगा जैसे: नल आ गया, नल चला गया।

 बिहारी ने तो यहां तक कह दिया

नर की अरु नल-नीर की, गति एकै कर जोइ।

जेतो नीचो ह्वै चले, तेतो ऊँचो होइ।।


 बम्ब


पिछली सदी के अधिकांश वर्षों में घरों, स्नानागारों, शौचालयों में जल वितरण के निजी साधन ( प्राइवेट कनेक्शन) कम लोगों के पास हुआ करते थे। मैदानी गाँवों में कुआँ, बावड़ी, तालाब, नदी या पहाड़ी स्थानों पर झरने, नौले, सोते आदि हुआ करते थे। कस्बों और शहरों में कुछ केंद्रीय तथा सुविधाजनक स्थानों पर सार्वजनिक नलों की व्यवस्था होती थी जिन्हें बंबा कहा जाता था। 

यह बंबा शब्द यों तो पंप से मिलता - जुलता है किंतु मूलतः यह पुर्तगाली भाषा का है ।पुर्तगाली से ही संभवतः अंग्रेजी में पहुँचा हो। गुजराती में बंबो, मराठी में बम्ब, पंजाबी में बम्बी भी इसी बंबा से जन्मे हैं। इटालियन भाषा में भी यह बॉम्बा ही है जहाँ इसे मूलतः लैतिन के "बॉम्बस" से व्युत्पन्न माना जाता है । पुर्तगालियों के साथ यह शब्द अनेक समुद्र और दो - तीन महाद्वीपों को पार करने के बाद भारत पहुँचा और यहाँ पूरी तरह देसी ढाँचे में ढलकर बंबा बन गया।

हिंदी में कहीं - कहीं विशेष आग्नेयास्त्र के लिए अंग्रेजी शब्द बॉम्ब (bomb) को भी बंब लिखने लगे हैं। इसकी वर्तनी "बम" है, चाहे दीवाली वाला हो या कोई और।

 

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