संभल और सँभल भिन्न शब्द हैं और अनुस्वार (ं )। अनुनासिक (ँ ) समझने के लिए बड़े उपयुक्त उदाहरण हैं! संभल उत्तर प्रदेश में मुरादाबाद जिले का एक शहर है जो आजकल चर्चा में है।
सँभल/ सँभाल संस्कृत संभरण (सँभलना) से है, जिसका अर्थ है गिरने फिसलने चोट आदि से बचना, सावधान रहना।
ं और ँ के प्रयोग को न समझने से अर्थ में भ्रम हो सकता है।
लगभग समान ध्वनियों का एक अन्य शब्द है संबल अर्थात सहारा। सरसरी दृष्टि में संभल का महाप्राण /भ/ अल्पप्राण /ब/ में बदल गया है। संबल संभार से है और इसका मूल अर्थ है पाथेय, यात्रा के लिए सामग्री। मार्गव्यय। कुछ नए शब्द (neonyms) बनाए गए हैं- सम्बलन (enforcement ) सम्बलित (reinforced). इनका मूल बल (force) है।
इसी संबल से कुमाउँनी में एक शब्द है 'सामल'। सामलै' पुन्थुरि , रास्ते के लिए सामग्री की पोटली।
देशज शब्द 'सब्बल' (गदाला, Crowbar) भिन्न है। सब्बल लोहे एक उपकरण है जिसका उपयोग चट्टान तोड़ने, खुदाई, निर्माण और बागवानी से जुड़े कई कामों में किया जाता है.
किन्हीं सज्जन की एक फ़ेसबुक पोस्ट पर ट्विटर और फ़ेसबुक पर बड़ी रोचक चर्चा हुई जिसमें कहा गया है कि "धोबी का कुत्ता घर का न घाट का" कहावत में कुत्ता नहीं, "कुतका" का प्रयोग सही है। यह लोकोक्ति सदियों से ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी, बुंदेली, नेपाली, कुमाउँनी सहित अनेक अन्य भाषाओं में बहुत पहले से उपस्थित है। 15-वीं सदी के संत कवि गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली में इसका प्रयोग मिलता है। इसका आशय ऐसे व्यक्ति से है जो एक ठिकाने पर जमकर कोई काम नहीं करता । बेकार उधर फिरनेवाला । निकम्मा आदमी। कहावत का कुत्ता घर का इसलिए नहीं कि आमतौर पर कुत्ते का काम होता है घर की रखवाली करना। जब घाट पर जाएगा, तो रखवाली कौन करेगा। घाट का इसलिए नहीं कि वहाँ उसके करने का कोई काम नहीं और आखिर वहाँ से भी धोबी के साथ लौट ही आएगा। इस लोकोक्ति का एक छोटा रूप भी हिन्दी में चलता है - घर का न घाट का। अंग्रेजी में इसके समकक्ष कहावत है: Whistling maids and crowning hen, are neither fit for gods, nor for men! "कुतका" हिन्दी में एक बैटनुमा मोटा डंडा या सोंटा है जो कपड़े को धोने के दौरा...
Gyanvardhak lekh.
जवाब देंहटाएं