नागरिकदेवो भव
तैत्तिरीय उपनिषद, शिक्षावल्ली में एक महत्वपूर्ण कथन है—
"मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव॥"
भारतीय संस्कृति की उदात्त भावनाओं को दर्शाने वाले प्रतिनिधि कथन मानकर इन सूक्तियों का उपयोग विविध क्षेत्रों में आदर्श वाक्य के रूप में किया जाता है।
इसी क्रम में और इन्हीं के अनुकरण पर एक नई अभिव्यक्ति भारतीय इतिहास में जुड़ी है– "नागरिकदेवो भव", जो प्रधानमंत्री कार्यालय के नवनिर्मित भवन पर एक आदर्श वाक्य के रूप में लिखी गई है।
कुछ सजग-सतर्क भाषा प्रेमी इस कथन की वर्तनी की शुद्धता-अशुद्धता पर विचार कर रहे हैं और इसे अशुद्ध ठहरा रहे हैं।
असल में हम जाने कब से "अतिथि देवो भव", "मातृ देवो भव" आदि पढ़ने-लिखने के अभ्यस्त हो गए हैं, जो कि हिंदी में ठीक हैं किंतु संस्कृत व्याकरण के अनुसार अशुद्ध हैं। इसलिए हमें लगता है कि नागरिकदेवो भव अशुद्ध है और शुद्ध होना चाहिए– "नागरिक देवो भव"!
मातृदेव, पितृदेव, या नागरिकदेव पद बहुव्रीहि समास माने गए हैं, इसलिए इनका अर्थ है–
मातृदेव: (माँ ही जिसकी देवता है ऐसा भव (बनो)।
इसी प्रकार पितृदेव, अतिथिदेव, आचार्यदेव और नया आगंतुक नागरिकदेव। संस्कृत में समास कर दिए जाने के बाद इन्हें एक पद माना जाता है, इसलिए एक शिरोरेखा के अंतर्गत लिखा जाता है। हिंदी उदार है इसलिए उसमें ऐसा बंधन नहीं है। हिंदी में समस्त पद के घटकों को अलग-अलग भी लिखा जा सकता है, यदि उससे अर्थ में भ्रम न हो रहा हो तो। किंतु दो शब्दों की छोटी-सी उक्ति के बारे में कोई कैसे निर्णय करेगा कि यह संस्कृत की है या हिंदी की? उत्तर सीधा है– क्रियापद 'भव' (=हो, बनो) को देखिए। 'भव' का प्रयोग हिंदी में नहीं होता। यह शुद्ध संस्कृत का है, (√भू, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन)। अतः पूरा कथन "नागरिकदेवो भव" संस्कृत भाषा का सिद्ध होता है, हिंदी का नहीं। इसलिए उसपर संस्कृत व्याकरण के ही नियम लगेंगे- समस्त पद को एक पद मानकर एक शिरोरेखा के अंतर्गत एक शब्द के रूप में लिखना। संस्कृत में इस समस्त पद का विग्रह अनेक प्रकार से हो सकता है–
* नागरिका एव देवा: यस्य स:
* नागरिकेषु देव:
* नागरिकाणां देव:
* नागरिका: यं देववत् भजन्ते/मन्यन्ते।
विग्रह चाहे जैसे करें, लिखा एक पद की तरह ही जाएगा "नागरिकदेवो भव"।
इस आलोक में "नागरिकदेवो भव" ठीक लिखा गया है।
इतना मान लिए जाने पर समस्या एक और शब्द पर आती है जो नागरिकदेवो भव के ठीक ऊपर लिखा गया है, "सेवा तीर्थ।" इस पर कोई विचार नहीं कर रहा है कि यह शुद्ध है या अशुद्ध।
हिंदी के अनुसार, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया, समस्त पद होते हुए भी वैकल्पिक रूप से सेवातीर्थ को "सेवा तीर्थ" (सेवा का तीर्थ) लिखा जा सकता है किंतु यदि सहयोगी पद पर हम संस्कृत व्याकरण से विचार कर रहे हैं तो सेवा तीर्थ को भी संस्कृत का मान जाना चाहिए और मिलाकर लिखा जाना चाहिए; अन्यथा यह एक ही घर में दो प्रकार के व्यवहार का प्रतीक हो जाएगा।
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[यह विवेचन मात्र भाषिक दृष्टिकोण से किया गया है। इसके पीछे कोई राजनीतिक मंतव्य नहीं है।]
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