भूरि-भूरि प्रशंसा या भूरी-भूरी प्रशंसा?
साधो! किसी की भूरि-भूरि प्रशंसा कीजिए—बस ध्यान रहे कि प्रशंसा करते-करते कहीं उसे भूरी-भूरी न कर बैठें!
‘भूरि’ संस्कृत का बड़ा ही काम का शब्द है—अर्थ है बहुत अधिक, प्रचुर, विपुल। इसलिए ‘भूरि-भूरि प्रशंसा’ का सीधा-सादा अर्थ है—बहुत अधिक प्रशंसा। वैदिक संस्कृत से लेकर हिंदी के श्रेष्ठ साहित्य तक भूरि का भूरि-भूरि प्रयोग मिलता है।
अब ज़रा आधुनिक भाषा का कमाल देखिए। बोलने में सुविधा, यानी मुख-सुख और प्रयत्नलाघव के फेर में छोटी ‘इ’ को थोड़ा खींच दिया गया और वह बड़ी ‘ई’ बन गई। बस, फिर क्या था—‘भूरि’ की मात्रा बदलते ही उसका अर्थ भी बदल गया। विपुल प्रशंसा पहुँच गई रंगशाला में और बन गई ‘भूरी-भूरी’! प्रशंसा तो एक भाव है और भाव का कोई रूप-रंग नहीं होता।
भाषाविज्ञान की भाषा में यह श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्दों के अनजाने और दोषपूर्ण प्रयोग का एक रोचक उदाहरण है। कहने वाला करना चाहता है—‘आपकी ढेर सारी प्रशंसा’, मगर एक मात्रा की फिसलन से ऐसा लगता है मानो वह कह रहा हो—‘आपकी प्रशंसा का रंग भूरा है!’
यानी एक छोटी-सी मात्रा ने अर्थ का पूरा मेकओवर कर दिया—‘प्रचुर’ से ‘रंगीन’ तक!
इसलिए, साधो, अगली बार किसी की तारीफ़ में भूरि-भूरि कहिएगा। आखिर प्रशंसा की मात्रा जितनी चाहें बढ़ाइए, मगर उसकी मात्रा ही मत बदल डालिए! मात्रा और रंग का यह घालमेल ऐसी साहित्यिक प्रशंसा को भी कभी-कभी ब्यूटी पार्लर के विज्ञापन में बदल देता है!
भाषा में भी कभी-कभी एक मात्रा ही पूरा मामला बिगाड़ देती है। अगली बार अगर आप मेरी प्रशंसा करने बैठे तो कैसी प्रशंसा करेंगे, भूरि या भूरी?
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