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खाना, बुकाना और बुकनी

संस्कृत √वृक्ण - व्रश्च् (छेदे– कुतरना) + क्त (भूत.कृदंत) कटा हुआ, बाँटा हुआ, फाड़ा हुआ, कतरा हुआ। वृक्ण से हिंदी में बुकना, बुकनी, बुकाना। कुमाउँनी में बुकूण (बुकाना) क्रिया है। कच्चे चावल (खाजा), खजिया, शिरोल, चिवड़ा बुकाए जाते हैं, अर्थात मुँह में रखकर धीरे-धीरे दाँतों से पीसकर चूरा बनाते हुए खाए जाते हैं। नेपाली, मैथिली में भी बुकना, बुकाना हैं।
बुकनू, बुकनी चूर्ण (पाउडर ) के लिए हैं। नमक की बुकनी, मिर्च-मसालों की बुकनी, अबीर-गुलाल की बुकनी आदि प्रयोग सुनाई पड़ते हैं। एक प्रसिद्ध चाय कंपनी "बुकनी चाय" के नाम से डस्ट टी बेचा करती थी। 
बुकनू एक बहु उपयोगी चूर्ण उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विविध व्यंजनों में मिलाकर बड़े चाव से खाया जाता है। कनपुरिया बुकनू, बुंदेलखंडी बुकनू, कनौजिया बुकनू आदि अनेक सुप्रसिद्ध प्रभेद सुनाई पड़ते हैं।
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भोजन करने के लिए खाना क्रिया यद्यपि पूरे उत्तर भारत में है, कुमाऊँ में इसके लिए कुछ विशेष क्रियाएँ और भी हैं; जैसे भसकूण (भस्काना), बुकूण (बुकाना), कोचीण (कूँचना), धपोड़ण (धपड़ना), सपोड़ण (सपोड़ना, चट कर जाना)।
भसकूण (भसकना) संस्कृत भक्षण से है।‌ भक्षण —> भकसन‌ —> भसकन (वर्ण विपर्यय से)। कुमाऊँ में जल्दी-जल्दी खाने के लिए इस क्रिया का प्रयोग किया जाता है 
बस 2 मिनट में भस्का गया।
कोचीण, सपोड़ण और धपोड़ण तीनों अनुकरणात्मक शब्दों से बनी क्रियाएँ हैं। कोचीण में कुछ अवमानना और डाँट-डपटकर खाने-खिलाने का भाव है। कुछ स्थानीय व्यंजनों – भटिया, डुबुक, जौला जैसे अर्धतरल खाद्य पदार्थों को धपड़क् -धपड़क् की आवाज़ करते हुए खाना धपोड़ना और सारे भोजन को जल्दी-जल्दी निपटा देने के लिए सपोड़ण क्रिया है।

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