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दालचीनी के बहाने...

दालचीनी
दालचीनी भी बड़ा अजीब शब्द है। इसमें न तो दाल है, न चीनी। थोड़ी सी मिठास है, जो तीखेपन से दब जाती है। और दाल? दाल तो न अरहर, न मूँग-मसूर; न साबुत, न धुली‌। मिलती है पेड़ की छाल से।

दरअसल दालचीनी शब्द अरबी से शाही तोहफ़े के रूप में भारत आया । दालचीनी पैदा होती थी इंडोनेशिया में। वहाँ से चीन, और चीन से रेशमी मार्ग से होकर सार्थवाहों के साथ पहुँची अरब। अरब वालों ने देखा कि यह तो चीन से आई हुई मसाले वाली दार (लकड़ी) है, तो नाम हो गया दार-उल-चीनी (चीन क लकड़ी! और भारत में दालचीनी बनकर हमारी रसोई को सुगंधित कर रही है। हम में से जो अरबी-फ़ारसी से परहेज़ करते हैं वे भी दालचीनी के बिना नहीं रह सकते।

संस्कृत में दालचीनी को उसके स्वाद के आधार पर ही नाम दिया गया। संस्कृत में दालचीनी को दारुसिता (सिता= चीनी) अर्थात चीनी जैसी मीठी लकड़ी, त्वक् (त्वचा, छाल), गुडत्वक् (गुड़ जैसी मीठी छाल) कहा जाता है। आयुर्वेद में दालचीनी को अनेक रोगों में लाभदायक बताया गया है।
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