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बम पुलिस

आज़ादी से लगभग 150 वर्ष पहले के कालखंड में एक शब्द बहुत प्रचलित था "बम पुलिस"। आज लोग इसे बम निष्क्रिय करने वाला पुलिस दस्ता समझेंगे, किंतु तब इसका विशेष अर्थ में प्रयोग होता था। 
भारत में परंपरा से लोटा लेकर खुले में शौच जाने की प्रथा थी। कुछ शहरों में अंग्रेजों ने खुले में शौच का चलन रोकने के लिए कुछ क्षेत्रों को घेराबंद कर दिया। उस घेरा बंद इलाके में सार्वजनिक शौचालय बनाए गए और उनकी व्यवस्था के लिए कुछ कर्मी रखे गए । घेराबंद शौचालयों को bound place कहा गया। परंपरा से खुले में शौच जाने के आदी लोगों पर नियंत्रण के लिए, उन्हें घेर-घार कर सार्वजनिक शौचालयों की ओर भेजने के लिए जिन कर्मचारियों की व्यवस्था की गई उन्हें बोंड प्लेस पुलिस कहा गया और यही शब्द लोक में बम पुलिस बन गया। यह शब्द आज भी सफाई कर्मियों के लिए प्रयोग में है। पुराने लोगों से सुना जाता है कि मल निकासी के अतिरिक्त लोगों को खुले में शौच के लिए जाने से बलपूर्वक रोकना, उन्हें दंडित करना भी उनका काम था। संभवतः इस काम को पुलिस वाले काम से जोड़कर बाउंड प्लेस बम पुलिस बन गया हो।

पहाड़ में बम पुलिस की कहानी थोड़ा सा भिन्न है। 1896 में उत्तर प्रदेश (यूनाइटेड प्रोविंस ऑफ़ आगरा एंड अवध) की नव विकसित ग्रीष्मकालीन राजधानी नैनीताल में हैजा फैला। प्रांत के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर ऐंथनी मैकडोनाल्ड ने भाँप लिया कि इस बीमारी का संबंध खुले में शौच जाने के कारण नैनीताल के पानी में घुलती जा रही गंदगी के साथ है। पहाड़ में यत्र-तत्र बिखरा मानव मल अंततः बहकर इसी झील में आता था और झील का पानी ही पीने के काम भी आता था। इसलिए एंथनी ने पाखाना सफाई के लिए ‘बम पुलिस’ व्यवस्था नैनीताल में लागू करने की सोची। 
ऐंथनी ने प्रशासन से मिलकर यह आदेश निकाला कि नैनीताल में कहीं भी कोई खुले में शौच नहीं करेगा। विदेशियों के बंगलों और भारतीयों के मुहल्लों से मल एक ही जगह पर एकत्र किया जाएगा। आबादी से दूर के कुछ स्थानों पर उसे जलाने के लिए धमन भट्टियाँ बनाई गईं। इस काम के लिए नियुक्त  कर्मचारी मैले को ढोकर वहाँ ले जाते। बाद में मल ढोने का काम म्युनिसपैलिटी की गाड़ियों के द्वारा किया जाने लगा किंतु मल को एकत्र कर गाड़ी में चढ़ाने और उतार कर भट्टी में ले जाने का काम  बम पुलिस कर्मचारी ही करते रहे। धमनभट्टी में लीसा युक्त चीड़ के पत्तों (पिरूल) और लकड़ियों से उसे जला दिया जाता था। कालांतर में मल को जलाने के लिए बनाई गई धमन भट्टी भी बम पुलिस कही जाने लगी।

कुछ मैदानी शहरों में आज भी बमपुलिस सार्वजनिक शौचालय को कहा जाता है। कानपुर जैसे औद्योगिक नगरों में मजदूर बस्तियाँ होती थीं। उनके उपयोग हेतु ऐसे प्रसाधन गृहों का निर्माण किया गया था। इनकी देखरेख करने वाले को बम पुलिस का दरोगा कहते हैं। मुज़फ़्फ़रपुर बिहार में मोती झील के निकट एक बस्ती का नाम आज भी है- बम पुलिस लाइन।
फणीश्वरनाथ 'रेणु' के उपन्यास 'कितने चौराहे' में इस बम पुलिस का जिक्र कई बार है। जिन्होंने उसे पढ़ा होगा, संदर्भ से समझ गए होंगे। फणीश्वरनाथ रेणु के अतिरिक्त मनोहर श्याम जोशी के 'कसप' उपन्यास में इस बम पुलिस का उनके ही अंदाज में रोचक वर्णन है।
मनोहरश्याम जोशी के "कसप" वाले उल्लेख को लेकर बटरोही ने एक संस्मरणात्मक कहानीनुमा व्यंग्य रचना बुनी जो "नया ज्ञानोदय" अप्रैल, 2019 में प्रकाशित हुई। मनोहरश्याम जोशी को पढ़ने वाले जानते हैं कि "गू, गुएन"-जैसे शब्द अपने किस्से कहानियों में पिरोना उनकी "मनोहर"-शैली में शुमार है। रेणु या जोशी जी को अथवा बम पुलिस को समझने के लिए गू की गुएन को सहना पड़ेगा- हमें भी और बटरोही जी को भी।


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