सिख धर्म के तीसरे गुरु, गुरु श्री अमरदास जी का प्रसिद्ध कथन है–
"सूरा सो पहचानिए, जो लरै दीन के हेत, न
पुरजा-पुरजा कट मरै, कबहुँ न छाँड़ै खेत॥"
खेत संस्कृत के क्षेत्र से बना है और बहु-अर्थी शब्द है। संस्कृत में क्षेत्र का अर्थ खेत, भूमि, बाड़ा या मैदान के अतिरिक्त देह , विस्तार, पत्नी आदि भी है। अनेक तीर्थस्थानों को भी क्षेत्र कहा गया है।
हिंदी में सामान्यतः हम उस भूमिखंड को खेत कहते हैं जो जोतने-बोने और अन्न, शाक-सब्ज़ी आदि की फसल उगाने के योग्य हो। प्रदेश, इलाका, भूभाग या मंडल भी क्षेत्र कहलाता है। किसी देश या दुनिया का एक विशेष हिस्सा भी क्षेत्र है, जो अपनी भौगोलिक, प्राकृतिक या सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण अन्य क्षेत्रों से अलग पहचाना जाता है। विशेषता के अनुसार ही आकार में यह छोटा भी हो सकता है (जैसे- हिंदी भाषी क्षेत्र) और विस्तृत भी (जैसे- यूरोपीय क्षेत्र)।
पुराने ज़माने में लड़ाइयाँ विशाल मैदान में आमने-सामने हुआ करती थीं, इसलिए युद्धक्षेत्र, रणक्षेत्र, लड़ाई के मैदान को भी खेत कहा गया।
हतौं न खेत खेलाइ खेलाई ।
तोहि अबहि का करौं बड़ाई ।
—मानस, ६ । ३४ ।
युद्धक्षेत्र के अर्थ में खेत से अनेक मुहावरे भी बने हैं।
खेत आना, खेत रहना= युद्ध में मारा जाना। लड़ाई में वीरगति को प्राप्त होना (शहीद होना)। यह मुहावरा उस स्थिति में प्रयुक्त होता है जब कोई सैनिक अपनी मातृभूमि के सम्मान की रक्षा के लिए लड़ते हुए युद्ध के मैदान में ही अपनी जान दे देता है।
इसी प्रकार
खेत करना = युद्ध करना, लड़ना ।
खेत छोड़ना = रणभुमि में परास्त होना, युद्ध छोड़कर भागना।
खेत रखना = समर में विजय प्राप्त करना।
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