दोनों उपन्यासों के नाम अपने आप में रहस्य हैं और पाठक को उनका अर्थ धीरे-धीरे स्पष्ट होता है। आइए, दोनों पर क्रमशः संक्षेप में विचार करें।
क्याप
"आप कहेंगे कि यह कथा तो क्याप-जैसी हुई ! धैर्य-धन्य पाठको, यही तो रोना है।"
~मनोहर श्याम जोशी
क्याप दो घटकों से निर्मित होता है– /क्या/ सर्वनाम (यहाँ अनिश्चयवाचक) और निपात /प/।
क्याप का हिंदी में कोई समानार्थी शब्द नहीं, और कुमाईं में इसकी अनेक अर्थ छबियाँ हैं! उन्हें कुमाउँनी के संदर्भ में समझना ही उपयोगी होगा।
कुछ प्रयोग किस प्रकार हैं –
* क्याप भै = अजीब, अनगढ़, निराशाजनक, बेकार
* क्याप है गो != जाने क्या हो गया
* क्याप छु हात में = कुछ अनजाना है...
*भोव क्याप हो = भविष्य अनिश्चित है
* हमरि क्याप = हमारी बला से
* क्याप चितुणयूँ = अजीब-सी बेचैनी
* क्याप है पड़ = अनचाहे अप्रत्याशित घट गया
* क्याप कै, क्याप सुण = कुछ कहा कुछ और ही सुना
कुछ अजीब-सा, अनगढ़, अनदेखा या अनबूझा क्याप की अर्थ परिधि में आता है। ऐसा कुछ जिसे शब्दों में पूरी तरह परिभाषित न किया जा सके।
अनिश्चितता या अबूझपन में अधिक बल देने के लिए /प/ निपात को दुहरा दिया जाता है–
* क्याप्प भै अदपगाल जस। (अजीब है अधपागल-जैसा)
* क्याप्प कुना (न जाने क्या कह रहा है, स्पष्ट नहीं है)।
कसप
कस (रीतिवाचक क्रियाविशेषण- कैसा)+ प (अनिश्चार्थक निपात ) से बना है 'कसप'। 'कसप’ का अर्थ है – ‘क्या जानें’/ ‘पता नहीं कैसा’।
'कसप' उपन्यास एक प्रेम कथा पर आधारित है और बक़ौल जोशी, “अगर आप इस शीर्षक से चौंके हों तो भी कोई हर्ज नहीं। चौंका होना प्रेम की लाक्षणिक स्थिति जो है। जिन्दगी की घास खोदने में जुटे हुए हम जब कभी चौंककर घास, घाम और खुरपा तीनों भुला देते हैं, तभी प्यार का जन्म होता है।”
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