सांसारिक मोह-माया का, कर्तव्यों और आग्रहों का पूर्ण परित्याग करके स्वयं को ईश्वर या उच्च उद्देश्य के प्रति समर्पित करने की स्थिति को इन तीन शब्दों में से क्या कहा जाए, यह प्रश्न है।
संलग्न चित्र में विशेषज्ञ वक्ता का निर्णय स्पष्ट है। कार्यक्रम का नाम "ज़िद" (हठ) सर्वथा उपयुक्त है। इस बात का हठ कि जो हम कहें वही ठीक। भाषा के अपने नियम होते हैं, वहाँ ज़िद नहीं चलती। "संन्यास" ठीक है, और "सन्न्यास" भी। हिंदी में संन्यास अधिक प्रचलित है।
कैसे? आइए, जानें।
संस्कृत व्याकरण में एक सूत्र है "मोऽनुस्वारः", यह म् के बाद व्यंजन होने पर म् को अनुस्वार करता है । इस सूत्र से सम्+न्यास को 'संन्यास' हुआ। अब सं+न्यास को "अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः" (अनुस्वार को वर्गीय व्यञ्जन परे होने पर परसवर्ण अर्थात बाद वाले वर्ण का पंचमाक्षर) सूत्र से परसवर्ण हुआ तो सन्न्यास हुआ। अब "वा पदान्तस्य" (पदान्त के अनुस्वार को वर्गीय व्यञ्जन परे होने पर विकल्प से परसवर्ण होता है)। इस सूत्र से परसवर्ण विकल्प से होगा अर्थात होगा भी और नहीं भी होगा। सं न्यास का सं एक पद है अतः पदान्त में अनुस्वार होने से संन्यास सिद्ध हुआ। विकल्प से सन्न्यास भी बनेगा।
'सन्यास' को स्वीकार किया जाए तो खींच-खाँचकर इसका अर्थ बनेगा– न्यास सहित।
॥इति सिद्धम्॥
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें