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ख़सम चर्चा



अब तो होली खेल - खालकर आप घर लौट आए होंगे। तो फिर कुछ ख़सम शब्द पर बात करें? आप भी कहेंगे कि मैंने भाँग ज्यादा खा ली होगी। होली के दिन क्या शब्द लेकर बैठ गया! यदि आप मुझे यह ब्लॉग लिखते समय भाँग के नशे में, या किसी भी नशे में मान रहे हैं तो आप ठीक नहीं सोच रहे हैं । शब्द तो शब्द होते हैं।  

अब इस ख़सम को देखें ... । 

एक होली पूरे हिंदी क्षेत्र में बड़ी प्रसिद्ध है, प्रवासी भारतीयों में भी। मस्ती से गाई जाती है । स्त्री - पुरुष मिलकर गाते हैं, " रंग में होली कैसे खेलूँ री मैं सांवरिया के संग..."  इसमें एक शब्द आता है ख़सम। "ख़सम तुम्हारो बड़ो निखट्टू, चलो हमारे संग" और ख़सम को आप उसी अर्थ में लेते हैं जिस अर्थ में वह है। हिंदी में, उसकी बोलियों-उपभाषाओं में, समूचे हिंदी क्षेत्र में ख़सम पति को कहा जाता है।
कुछ कथित सभ्य-संभ्रांत लोगों में ख़सम शब्द कुछ मोटा-सा, भद्दा-सा,गँवार-सा अश्लील शब्द माना जाता है। सौंदर्यशास्त्री  उसमें "ग्राम्यत्व दोष" ढूँढ़ लेते हैं! लेकिन अरबी में जहाँ से यह शब्द चला वहाँ ख़सम/ ख़स्म का प्रधान अर्थ है: दुश्मन, शत्रु, एनिमी! गौण अर्थ मालिक। फ़ारसी में आते-आते संभवतः इसी मालिक, स्वामी से इसका अर्थ पति, खाबिंद भी हो गया।

अब बताइए शब्द जब चलते हैं तो रूप बदलते हैं, अर्थ बदलते हैं -- इतने कि पहचानने कठिन हो जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे आप होली में ढेर सारा अबीर- गुलाल लगाकर, कालिख़ पुतवाकर घर लौटें तो आपकी पत्नी अपने खसम को पहचानने से इनकार कर दे। 

एक बात और बता दें। इस ख़सम को आप देहाती भले ही मानें, ठेठ देहाती बोली में, खासकर मेरठ, बागपत और हरियाणा, शायद मेवात, राजस्थान की बोली में आज भी, अनजाने ही सही, अरबी वाले मूल अर्थ में प्रयोग होता है । झुँझलाहट या गुस्से में कह दिया जाता है, "रै, इब चुप भी कर मेरे खसम! जान लेगा के मेरी?" या ऐसे ही कुछ अन्य प्रयोग भी हैं जिनमें खसम का अर्थ दुश्मन के निकट एक बैठता है। 

अब आपका हृदय परिवर्तन हो गया हो तो शब्दकोश में तो अर्थ मत बदलिए, यह आपके बस का है भी नहीं । कम से कम इस ख़सम शब्द को देहाती मत समझिए। हो सके तो यह सोचिएगा कि कबीर की यह "दोनों कुल उजियारी" ताल ठोक कर क्यों बताती है कि वह खसमखानी है। 
 "माई, मैं दोनों कुल उजियारी । 
बारह खसम नैहरै खायों, सोरह खायो ससुरारी । 
सासु ननद पटिया मिलि बँधलैं, ससुरहि परलैं गारी । 
जारो मारग तासु नारि की, सरिवर रचल हमारी ।"
 ~कबीर

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