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संदेश

निदेश और निर्देश

  निर्देश –निदेश  निर्देश में आज्ञा या आदेश जैसी बाध्यता तो नहीं, व्यापकता अवश्य है | व्यापक रूप से और सामान्यतः ये हितैषी ही होते हैं जैसे डॉटर रोगी को निर्देश देता है या शिक्षक छात्रों को प्रश्नपत्र हल करने के बारे में निर्देश देते हैं | वस्तुतः “निर्देश" संदेशवाहन की एक प्रक्रिया है जिसमें प्रेषित संदेश को विश्वास के साथ ग्रहण कर लिया जाता है” (~मैकडूगल) | आदेश में यह विशेषता होना ज़रूरी नहीं | निर्देश का प्रयोग प्रायः सूचना देना, बताना, मार्ग दिखाना आदि है | जैसे : सभी प्रश्न हल करने हैं |                        (सूचना) आप नहीं होंगे तो हमारा निर्देशन कौन करेगा?       (मार्ग दर्शन) निर्दिष्ट अनुच्छेद में स्पष्ट लिखा है | (बताए हुए/ निर्देश किए हुए} प्रबंधन में भी आदेश और निर्देश को भिन्न माना गया है और दोनों की एकात्मता पर बल दिया जाता है | प्रबंधन की भाषा में कुशलतापूर्वक कार्य सम्पादन के लिए सक्षम अधिकारी और अधीनस्थ के बीच सीधा संवाद आदेश है जब कि सामान्य उद्देश्य के लिए काम कर रहे समूह...

आदेश और आज्ञा

  आज्ञा औरआदेश  यह कल्पना ही असंभव है कि हमें किसी-न-किसी रूप में कभी किसी आज्ञा या आदेश का पालन न करना पडा हो | कभी तो इनमे अंतर करना कठिन हो जाता है कि यह जो कहा गया है, वह आदेश है या आज्ञा | और इस नासमझी का बड़ा अंतर पड़ सकता है | इन दोनों शब्दों में अंतर थोड़ा नाजुक अवश्य है पर है बड़ा रोचक | आप आज्ञाकारी हैं या नहीं यह तो आपको आज्ञा देने वाले जानें किंतु आदेश देने वाले जानते हैं कि उनके आदेशों का अनुपालन न करना सहज नहीं है | आज्ञा की अनदेखी कोई कर सकता है परन्तु आदेश की अनदेखी के लिए उसे सौ बार सोचना पड़ सकता है | आज्ञा-पालन विवशता नहीं है, यह श्रद्धा और कर्तव्य की परिधि में आता है | हमारा-आपका कर्तव्य है बड़ों की आज्ञा मानना किंतु न मानें तो यह बड़ों पर है कि वे उस अवहेलना को नैतिक मुद्दा बनाते हैं या नहीं, किंतु आदेश के साथ यह विकल्प उपलब्ध नहीं है | किसी भी आदेश के पीछे आदेश देने वाले का पद, रुतबा या अधिकार होता है और होता है उसमे निहित भय जो आपको आदेश का अनुपालन करने के लिए विवश करता है | आप आदेश से असहमत हों , तो भी | इस प्रकार आदेश में औपचारिकता भी है और बाध्यता भी | सक्ष...

हिंदी सीखते हुए तमिल भाषियों की कुछ भूलें

    संविधान में उल्लेख, बड़ा सा राजभाषा विभाग और बड़े-बड़े सरकारी तामझाम के बावजूद हिंदी का वैसा प्रचार नहीं हुआ, जैसा उसकी उपयोगिता देखते-समझते हुए उसे सहज स्वीकारने से हुआ है| पिछली सदी के छठे दशक से ही दक्षिण में, विशेषकर तमिलनाडु में, हिंदी विराध के स्वर मुखर होने लगे थे परंतु इसके पीछे राजनीतिक कारण अधिक थे| आम जन यह समझ रहे थे कि राज्य की सीमाओं से बाहर देश से जुड़ने के लिए हिंदी सीखना उनके अपने व्यापक हित में है और वे औपचारिक-अनौपचारिक सभी माध्यमों से हिंदी सीखने को उत्सुक थे| राजभाषा का प्रचार-प्रसार सरकार की ज़िम्मेदारी भले ही रहा हो, संपर्क भाषा का विकास स्वतः होता रहा और हिंदी की आंचलिक शैलियाँ विकसित होती गईं| आज जिन रूपों को हम बम्बैइया हिंदी, हैदराबादी हिंदी या तमिल हिंदी कहते हैं वे संपर्क भाषा हिंदी के ही रूप हैं| भाषाविज्ञान के क्षेत्र में आधिनिक अनुसंधानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य लगभग छह वर्ष की आयु तक अपनी मातृभाषा में दक्षता पा लेता है| उस भाषा के नियमों के सुदृढ़ संस्कार उसके मस्तिष्क में बैठ जाते हैं| इसके बाद वह जो भी भाषा सीखता है, उसके नियमों को पहल...

ढाई आखर

 बचपन में पहाड़े रटाए जाते थे: दो दूनी चार।  पूर्णांकों के बाद अपूर्ण अंकों के पहाड़ों में पहला पहाड़ा था- एक पव्वा पव्वा, दो पव्वा आधा..। फिर आते थे अद्धा, पौना, सवा, डेढ़ और ढाई। आज पव्वा जिस अर्थ में भी जाना जाता हो, सोचना पड़ता है यह पव्वा क्या है? असल में यह पाव है जो संस्कृत के पाद से बना है। एक संख्या को जब हम चार भागों में विभक्त करते हैं तो उनमें से एक भाग पाद अर्थात पाव (1/4), चौथाई है। दो पाव (2/4) आधा (1/2) और तीन पाव (3/4) पौना। इनकी व्युत्पत्ति थोड़ी रोचक है। ये चले तो संस्कृत से हैं लेकिन प्राकृत, अपभ्रंश तथा अनेक लोक भाषाओं में ऐसे तराशे गए हैं कि आज सरलता से पता ही नहीं लगता कि इनका मूल क्या था! तो एक के साथ जब पाद (पाव) जुड़ा तो शब्द बना सपाद अर्थात पाद सहित और सपाद का बन गया सवा। पुनः शंका कि सवा एक क्यों नहीं? प्रसंगवश यह जानना रोचक होगा कि एक की संख्या लोक में कुछ हीन, रीती, अशुभ-सी मानी जाती है। इसलिए गणना के प्रारंभ में एक का प्रयोग नहीं किया जाता था। पुराने पंसारी अपनी तौलें गिनते हुए पहली तौल को "एक" कहकर गिनना प्रारंभ नहीं करते, वे पहली तौल को "राम...

स्वप्न और सत्य: संस्कृत के संदर्भ में

  केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय विधेयक 2019 राज्य सभा से भी पारित हो गया है| इससे पहले दिसंबर २०१९ में इसे लोकसभा पास कर चुकी है| अब चूंकि कुछ संशोधनों के साथ राज्यसभा से पारित हुआ है, इसलिए पुनः लोकसभा भेजा जाएगा और पारित किए जाने पर अधिनियम बन जाना निश्चित है क्योंकि लोकसभा से पारित होना अब एक औपचारिकता भर है| दुविधा यह है कि क्या इसे बहुत बड़ा कदम मान कर सरकार को बधाई दी जाए? यों इस विधेयक में नया कुछ नहीं है सिवा इसके कि इसके पारित हो जाने से दिल्ली स्थित राजकीय संस्कृत संस्थान और लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत संस्थान तथा तिरुपति स्थित वेंकटेश्वर राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्ज़ा मिल जाएगा| कोई नया विश्वविद्यालय नही खोला जाना है|देश में पहले से चल रहे १५- १६ संस्कृत विश्वविद्यालयों में से ही इन तीनो को चुना गया है और उन्हें केंद्र शासित घोषित किया जा रहा है| इससे एक लाभ तो यह है कि विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ती है। साथ ही बजट अनुदान आदि में वृद्धि होती है। परिणामस्वरूप कर्मचारियों के वेतन बढ़ जाते हैं| किन्तु केन्द्रीयकरण से शिक्षा और शिक्षण की गुणव...

कविराज और वैद्यराज

  कवि शब्द संस्कृत की √कु धातु से बना है। अदादि गण, परस्मैपदी कु के अनेक अर्थों में हैं कूजना, गूँजना, मधुर स्वर करना। कु से इ प्रत्यय जोड़कर निष्पन्न होता है कवि। प्रयोग की दृष्टि से कवि अनेक आयामी है। सर्वज्ञ, प्रतिभाशाली,  विचारवान, बुद्धिमान, विचारक, ऋषि, कविता रचने वाला, प्रशंसनीय आदि इसके अर्थ हैं। सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु, शुक्राचार्य, वाल्मीकि को भी कवि कहा गया है। कवि शब्द के साथ जो प्रमुख अर्थ बिंब बनता है उसमें प्रधान है कोई रचनाकार, जो काव्य रचना करता हो। संस्कृत में तो कवि सब प्रकार के रचना कर्मियों को कहा गया है चाहे वह कविता, नाटक, कहानी, गल्प,  निबंध कुछ भी लिखता हो। दूसरी ओर भगवान विष्णु को भी कवि कहा गया है । प्रबुद्ध, मनीषी, विचारवान भी कवि हैं। उपनिषद के कथनानुसार कवि का एक अर्थ विद्वान भी है। यथा- "...क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयो वदन्ति।"(कठोपनिषद्) किसी ने तो यह भी कह दिया के कवि अनुशासन या नियमों के अंकुश के परे होते हैं- "निरंकुशा हि कवयः।" जो हो, किंतु मेरी समस्या यह है कि आयुर्वेद के विशेषज्ञों को "कविराज...

लट्ठ लकार : एक संस्मरण

  भाषा में रुचि होना कभी-कभी ऐसा सिर दर्द उत्पन्न करता है जो माइग्रेन से भी भयानक हो। लहरें-सी उठती हैं और दर्द वाला बेचैन। कोई चिकित्सक न मिले तो दशा बिगड़ती जाती है। ये भौतिक चिकित्सक काम आते नहीं । ऐसा ही एक दर्द एक बार मेरे सिर में जन्मा। मान लिया मैंने कि यह तो ऐसी समस्या है जिसका कुछ बड़ा ही निदान होना चाहिए। आखिर आचार्य शंकर ऐसी व्याकरणिक अशुद्धि कैसे कर सकते हैं! बस, सिर घूम गया। सौभाग्य से उन दिनों राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद की अनेक गोष्ठियाँ साथ-साथ चल रही थीं। हिंदी-संस्कृत के बड़े - बड़े विद्वान पधारे थे। समाधान के लिए एक से एक शलाका पुरुष उपस्थित थे। पहले मैंने परम विद्वानों के पास न जाकर अपने साथ दूसरी पंक्ति के सहयोगियों के सामने निवेदन किया कि भाई शंकराचार्य ऐसी गलती कैसे करेंगे! वे भी सुनकर चौंके। बात आगे बढ़ी। एक हमारे अभिन्न आदरणीय मित्र जो अब दिवंगत हो गए और तब एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एमेरिटस थे, उन से निवेदन किया। थोड़ी देर विचारनेके बाद उन्होंने कहा आचार्य शंकर का प्रयोग है, सो आर्ष प्रयोग मान कर चलिए। हम तो कुछ भी मानने को तैयार थे फिर भी एक...