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और की और-और अर्थ-छबियाँ


और की और-और अर्थ छबियाँ

हिंदी में 'और' एक बहु प्रचलित शब्द है और बहु अर्थी भी। सामान्यतः इसे समुच्चयबोधक या योजक माना जाता है जो दो पदों या उपवाक्यों को जोड़ता है। जैसे
~घोड़े और गधे। (दो पदों का योजक)
~वह आया और चला भी गया। (दो उपवाक्यों का योजक)
औरै भांति कुंजन में गुंजरत भौंर-भीर, 

औरै डौर झौंरन में बौरन के ह्वै गये। 
कहै पद्माकर, सु औरै भाँति गलियान, 
छलिया छबीले छैल औरै छवि छ्वै गयै॥ 
औरै भाँति बिहंग-समाज में आवाज़ होति, 
ऐसे ऋतुराज के न आज दिन द्वै गये। 
औरै रस औरै रीति औरै राग औरै रंग, 
औरै तन औरै मन औरै वन ह्वै गयै॥ 
अर्थ के अनुसार और को समुच्चयबोधक ही नहीं, अन्य व्याकरणिक कोटियों तथा अर्थ छबियों में भी देखा जा सकता है ; जैसे :
~अभी और लोग आएँगे। (विशेषण)
~कुछ और दीजिए। (क्रियाविशेषण)
~काम भी करो और ताने भी सुनो। (परिणाम)
~मैं और चुपचाप सुनता रहूँ! (विपरीतता या विलक्षणता)
~एक मैं, और एक तुम! (विपरीतता, विरोध)
~और क्या तुम उसे कंधे पर बिठाते! (जो हुआ उससे अधिक की चाहत)
~और मुँह लगाओ मूर्खों को। (दुष्परिणाम)
~अगर कुछ और परिश्रम करते तो सफल हो जाते। (विशेषण)
~और कोई इस झगड़े में क्यों पड़ने लगा? (विशेषण; दूसरा, अन्य)
~गाड़ी और तेज चलाओ। (क्रियाविशेषण) 
~यह आदत मेरी नहीं, किसी और की होगी। (सर्वनाम)
~और-और बातें करता रहा, काम की बात कोई नहीं। (भिन्न-भिन्न)
~और क्या! (गर्वोक्ति)
~~और तो और, पहले आप ही करके देखिए । (बाकी जाने दो) 
~और तो क्या, घर के लोग नहीं मानेंगे।  (दूसरों की बात छोड़ें)
~और तो और, यह छोकरा भी ज़बान लड़ाता है।
~और ही कुछ।  (सबसे निराला)
~ और ही और (अनोखा, आश्चर्यजनक)
~और तो क्या, पानी तक को नहीं पूछा। (और बातें तो दूर)
~चलो, कहीं और चलें। (दूसरे नए स्थान पर)

किसी से मिलने पर बात की शुरुआत 'और' से होती है इस 'और' में पूरा वाक्य है - 'और सुनाइए; हालचाल बताइए।'
और, उपर्युक्त प्रयोगों से भिन्न और का एक और प्रयोग है। जब टेलीफोन में कोई कहे 'और सुनाओ' तो सीधा अर्थ है कि बात करने के लिए कुछ बचा नहीं, यों ही टाइम पास करें या बंद करें?

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