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पाँच दिन की बेहोशी का महाकाव्य

#नवीन_जोशी का उपन्यास "टिकटशुदा रुक्का" महीना भर पहले ही पढ़ लिया था। उस से दस दिन पहले भी पढ़ चुका हो सकता था पर "उनकी" जिद थी कि पहले वे पढ़ेंगी। समझौता इस बात पर हुआ कि जब तक मैं भी न पढ़ लूं तब तक उसके बारे में कोई चर्चा नहीं करेगा। यह शर्त निभाना उनके लिए बेहद कठिन रहा होगा, यह मैं तब समझ पाया जब मैंने भी पूरा उपन्यास पढ़ लिया। पढ़ लेने के बाद मैं स्वयं अनेक सवालों में उलझ गया। कथानक, प्रस्तुति, सामाजिक हलचलों का बिंब-प्रतिबिंब, संघर्ष, विजय- पराजय, बड़ी-छोटी जाति, शोषण, कॉर्पोरेट हृदयहीनता, छद्म, प्यार, समर्पण, संघर्ष और भी जाने क्या-क्या! और इस सबको पिरोने-परोसने का अंदाज़ बिल्कुल महाभारत के संजय की तरह, जो भाइयों की मारकाट को भी सहज रूप में सुना देता है। बस। मैं जैसे बिल्कुल सन्न था, संज्ञा हीन। चाहते हुए भी उपन्यास के बारे में कुछ नहीं लिखा। लगा जितने आयामों को लेखक एक कैनवास पर सहजता से उतार गया है, वहां तक पहुंचना तो दूर, उन्हे पूरा-पूरा छू पाना भी मेरे जैसे पाठक के लिए जैसे एक चुनौती है। खानदानी कर्जदार दीवान का संघर्ष केवल वर्ग संघर्ष नहीं है। ...

गंज शब्द की व्युत्पत्ति और व्याप्ति

#गंज की व्युत्पत्ति और व्याप्ति गंज शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर हिंदी में दो मत हैं। एक के अनुसार यह शब्द भारत-ईरानी परिवार की पुरानी मीडियन भाषा का है और फ़ारसी के माध्यम से हिंदी तक पहुंचा है। दूसरे मत के अनुसार यह हिंदी का ही संस्कृत के माध्यम से आया हुआ शब्द "गञ्ज:' है जिसका अर्थ है भंडार, रत्न कोष, अन्न कोष। शब्द की उत्पत्ति फ़ारसी گنج से हो या संस्कृत "गञ्ज" से, इसके योग से भारतीय स्थान नामों में बड़े रोचक संकर (hybrid) शब्द बने हैं। भारत भर में सैकड़ों गंज हैं। शायद ही कोई ऐसा शहर/कस्बा हो जहाँ कोई गंज न हो। तत्सम शब्दों से: संयोगिता गंज, गौरी गंज; तद्भव शब्दों से: मुट्ठीगंज, लोहार गंज, किशनगंज, सियागंज; देशज शब्दों से: डोरी गंज, माल गंज अंग्रेज़ी शब्दों से: कर्नलगंज, फारबिसगंज, मैक्लेओड गंज; फ़ारसी शब्दों से: हज़रतगंज, हबीबगंज, रकाबगंज। लखनऊ में एक प्रसिद्ध बाज़ार है हज़रतगंज, जो शाम को सैर-सपाटा करने वालों को बहुत प्रिय है। इससे एक शब्द बना लिया गया है "गंजिंग", जिसका अर्थ है हजरतगंज में घूमते हुए मस्ती करना। यदि आप लखनऊ में ही अमीनाबाद...

पाहुना

पाहुना शब्द संस्कृत के "प्राघुर्णक/प्राघुण" शब्द से बना है। जो घूमते-घूमते आपके घर आ जाए उस अतिथि को संस्कृत में ‘प्राघुण’ कहते हैं। पंचतंत्र में प्राघुर्ण तथा नैषध में प्राघुणिक शब्दों का प्रयोग हुआ है। पृथ्वीराज रासो में प्राहुन्ना शब्द मिलता है जैसे:  "चितरंग राय रावर चबे प्राहुन्ना बग्गा फिरे।" इसी शब्द से भारतीय भाषाओं के निम्नलिखित सभी शब्द निष्पन्न हुए हैं— प्राकृत:    पाहुण हिन्दी:    पाहुन बुन्देली:    पहाउना पंजाबी:    ਪਰਾਹੁਣਾ (पराहुणा) गुजराती:   પરોણો (परोणो) राजस्थानी:   पावणा/पामणा मराठी:   पाहुणा छत्तीसगढ़ी:   पहुना हिंदी की प्रायः सभी बोलियों में पाहुन अतिथि के लिए कम, दामाद के लिए अधिक प्रयुक्त होता है। कुमाउँनी में पाहुना/पाहुनी क्रमशः पौण/पौणी (पौन,पौनी) हैं जो अतिथि के रूप में पधारे इष्ट मित्र, अभ्यागतों के लिए है। गढ़वाली में बारात में आए सभी मेहमान पौण हैं। नेपाली में पाहुना दामाद है, समस्तपद 'पाहुना-पाछी' है। नेपाली की भाँति "पौण-पाछि" कुमाउँनी में भी मिलता है, संभव...

लला, लल्ला और लल्लू

इधर दो-तीन दशकों से राम लला शब्द अधिक प्रचलन में आया है यद्यपि इसका पहला प्रयोग तुलसी (1523-1632) की एक रचना "राम लला नहछू" में हुआ है। किसी नाम के साथ जुड़ जाने पर लला उसके बालक रूप का द्योतक हो जाता है। रामलला अर्थात बाल स्वरूप राम। लला शब्द संस्कृत मूल का है। संस्कृत में √लल् धातु दुलारने, पुचकारने, लाड़- प्यार करने के अर्थ में है। इसी से लालन, लाल्य, लालनीय विशेषण बने हैं। लालयेत् पर एक प्रसिद्ध सूक्ति है लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत् । प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ॥ बच्चे के लिए लाल, लल्ला, लल्ली, लालन बने हैं जो अवधी, ब्रज, बुंदेली आदि बोलियों में बहुत प्रयुक्त होते हैं। कुमाउँनी में देवर को लला/लल्ला कहा जाता है क्योंकि छोटा होने के कारण वह भी भाभी के लिए बच्चे के समान लालनीय होता था। तब विवाह छोटी उम्र में ही हो जाते थे। कृष्ण के लिए भी लाल, लला, लल्ला विशेषणों का प्रयोग होता है। यहाँ इसका अर्थ।नन्हा, प्यारा, दुलारा के निकट है। पंजाबी का लोकप्रिय संबोधन, "ओए लाले दी जान !" इसी लाल से विकसित मानी जा सकती है। प्यारे बच...

थाली और ताली

थाली इधर कुछ विशेष घटनाओं ने थाली शब्द को बहुत प्रसिद्ध कर दिया है। इसकी व्युत्पत्ति पर ध्यान जाना स्वाभाविक है। इसे संस्कृत के स्था धातु से निष्पन्न माना जा सकता है किंतु रोचक यह है कि संस्कृत में स्थाली का अर्थ थाली नहीं है। स्थाली भोजन पकाने का मिट्टी का बर्तन है। स्था धातु से ही एक दूसरा शब्द बनता है स्थाल  जिसका अर्थ भोजन बनाने का पात्र और भोजन करने का पात्र दोनों हैं। स्थाल > थाल से ही स्त्रीलिंग शब्द बनता है थाली अर्थात छोटा थाल। थाली के प्रमाण इतिहास में बहुत पीछे तक जाते हैं हड़प्पा सभ्यता (3500 - 2500 ईपू) के प्राचीन स्थल कालीबंगा की खुदाई  में जो पात्र मिले हैं उनमें थाली लोटा भी हैं। मूलतः थाली मिट्टी की बनी होती थी किंतु अब धातु से निर्मित होती है। यह जानना रोचक हो सकता है कि उस जमाने में थाली केवल अमीर लोग प्रयोग में लाते थे। गरीबों के लिए शायद पात या पत्तल हो या कौन जाने वे करपात्री बनते हों।  आज प्रयोग की दृष्टि से देखें तो हिंदी में थाली एक पात्र भी है और पात्र में परोसे गए संपूर्ण व्यंजनों के लिए एक सामूहिक नाम भी। इस प्रकार गुजराती थाली, बंगाली...

जूठा

हिंदी की सांस्कृतिक शब्दावली में एक शब्द है "जूठा।" किसी के द्वारा खाना खाते हुए छुआ, खाने के बाद बचा अन्न, पीने से बचा पानी, जिस थाली या गिलास में खाया-पिया गया हो, खाना खाने वाले हाथों से छुआ हुआ पात्र आदि सबके लिए "जूठा" विशेषण का प्रयोग किया जाता है। एक बार की रसोई में प्रयुक्त सभी बर्तन भी जूठे माने जाते हैं। इतना ही नहीं, भोजन के बाद पूरा चौका जूठा हो जाता है। नए सिरे से सफाई के बाद ही इसका उपयोग किया जाता है। स्वच्छता की दृष्टि से यह अच्छी परंपरा है। पश्चिमी सभ्यता में "जूठा" की कोई विशेष संकल्पना ही नहीं है, इसलिए जूठा के लिए कोई उपयुक्त शब्द भी नहीं है। वे leftover food, remnants, pickings, refuse, garbage से काम चलाते हैं या lier food जैसे हास्यास्पद अनुवाद दिखाई देते हैं। हिंदी में जूठा शब्द को संस्कृत "जुष्ट" से व्युत्पन्न माना जाता है जो √जुष् धातु से बना है। जुष्ट से प्राकृत भाषा में जुट्ठ, हिंदी में जूठा। रूप रचना की दृष्टि से यह विकास स्वाभाविक लगता है किंतु अर्थ की दृष्टि से देखें तो जूठा संस्कृत के  "उच्छिष्ट...

फगुनहट मिल गई अचानक

आज सुबह फगुनहट मिल गई अचानक कनखियों से मुस्काई और बोली – 'ए – ए - ए-- कुछ ठहरो तब बढ़ो आगे अभी -अभी ताल में नहाई है किशोरी धरती और- बेपरदा बैठी है धूप में सुखा रही है लक-दक पीली ओढनी सरसों के खेत में ... '...उधर बौराने लगे हैं आम चम्पा का बरन और गोरा हो आया है गदरा गया है अंग-अंग कलियों का कल तक खिल जाएंगी टेसू की कलियाँ बरस पडेगा दहकता रंग क्षितिज के आर-पार भोर से ही घूमने लगेंगी फगुआ गाती टोलियाँ ... '... पर कोयल का कहीं अता-पता नहीं है न सेमल के गाछ में है, न आम की डाल में न टेसू के वन में है, न महुए के पेड़ में न जाने कहाँ चली गई पगली चलती हूँ, ढूँढ लाती हूँ उसे ...’ बेचारी फगुनहट आगे निकल गई ! मैं कैसे कहता—वह नहीं मिलेगी तुम्हें | उसे अब क्या पता कि कब गंधाती है मंजरी कब बौराते हैं आम कब कोसाता है महुआ कब घूमते हैं मदमाते-फगवाते होरिहार... कोयल तो अब शहर में बस गई है ! मैं कैसे कहता मैं किसे कहता ? भोली फगुनहट अब भी ढूँढती फिर रही है कोयल को, उसकी बोली को ... ... |