/ज्ञ/ में दो ध्वनियाँ ज्+ञ हैं, जिसे उत्तर भारत में प्रायः 'ग्यँ' बोला जाता है, इसलिए ज् +ञान (ज्ञान ) का उच्चारण 'ग्याँन' किया जाता है; यद्यपि शब्द में ग् ध्वनि कहीं नहीं है। ञ को यँ का समध्वनिक मानने से ज्ञान= ग्याँन। जो ज् को ञ के साथ बोल सकते हैं, उनका उच्चारण 'ज्यँ' सुनाई पड़ता है, इसलिए ज्ञान> ज्याँन।
रोमन लिप्यंतरण में ज्ञान (ग्याँन)> Gyān और ज्ञान (ज्याँन)> jnāna (jñāna) लिखा जाता है।
ओड़िया, तेलुगु, मलयालम, तमिल में भी ज्ञान को gnāna ही कहते हैं। शायद कन्नड़ में भी। परंतु जब दक्षिण के संस्कृत पंडित अंग्रेजी (रोमन) में लिखते हैं तो jnāna और gnāna दोनों का प्रयोग करते हैं। कोंकणी में ज्ञ का उच्चारण "ग्न्य" जैसा होता है और मराठी में "द्न्य" जैसा– "द्न्यान"। कोंकणी में ज्ञान का उच्चारण "ग्न्यान", "द्न्यान" होता है और कहीं-कहीं ज्ञान भी।
नासिक्य /ञ/ ध्वनि का लिप्यंतरण /n/ से ही हो सकता है। उससे पूर्व /ज्/ को कहीं /ग/ और कहीं /ज/ बोला जाता है। इसलिए कहीं gyān, gnān, और कहीं jnāna.
संस्कृत √ज्ञा (जानना )+ घञ् से ज्ञान शब्द की निष्पत्ति होती है। ज्ञान की परिभाषा देते हुए कहा गया है – "मोक्षे शिल्पे शास्त्रे च या धीः सा ज्ञानं विज्ञानं च", अर्थात् मोक्ष (मुक्ति) और शिल्प (कला-कौशल) तथा शास्त्र (किसी विशिष्ट विषय या क्षेत्र से संबंधित विस्तृत और प्रामाणिक जानकारी) ही ज्ञान और विज्ञान है। पाँचों ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से तथा बुद्धि के द्वारा किसी विषय के बारे में जानना, समझना, परिचित होना, प्रवीणता प्राप्त करना ज्ञान के अंतर्गत आता है।
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