सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

आ रखा, जा रखा…

‘मैं आपके घर आ रखा हूँ, आप कहाँ जा रखे हैं?' हम दिनभर में न जाने कितने ऐसे वाक्य बोलते हैं, जो हमारे कानों को बिल्कुल सहज लगते हैं। दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और अब उत्तराखंड में भी ऐसे वाक्य अक्सर सुनाई देते हैं—“हाँ भाई, मैं स्टेशन पर आ रखा हूँ” या “वह तो कब का जयपुर जा रखा है।” बोलने वाले को अपनी बात एकदम साफ़ लगती है और सुनने वाला भी समझ जाता है कि अगला पहुँच चुका है। लेकिन ज़रा ठहरकर सोचिए—क्या हिंदी का व्याकरण भी इस बात को उतनी ही आसानी से हजम कर लेता है? जवाब है—नहीं। ‘आ रखा हूँ’ और ‘जा रखा हूँ’ में अनजाने ही दो अलग-अलग क्रियाओं का ऐसा घाल-मेल हो गया है, जिसे मानक हिंदी का व्याकरण सहज नहीं मानता। ‘रखना’ मूलतः सकर्मक क्रिया है—किसी वस्तु को कहीं रखा जाता है: “मैंने किताब मेज पर रख दी है।” इसके विपरीत ‘आना’ और ‘जाना’ अकर्मक क्रियाएँ हैं—इन्हें किसी कर्म की आवश्यकता नहीं होती। यहीं से गड़बड़ शुरू होती है। ‘रखना’ जब सहायक या रंजक क्रिया के रूप में आता है, तो सामान्यतः सकर्मक क्रियाओं के साथ जुड़ता है—“मैंने पत्र लिख रखा है”, “पैसे बचा रखे हैं।” लेकिन ‘आना’ और ‘...

भूरि-भूरि प्रशंसा और भूरी-भूरी प्रशंसा

भूरि-भूरि प्रशंसा या भूरी-भूरी प्रशंसा? साधो! किसी की भूरि-भूरि प्रशंसा कीजिए—बस ध्यान रहे कि प्रशंसा करते-करते कहीं उसे भूरी-भूरी न कर बैठें! ‘भूरि’ संस्कृत का बड़ा ही काम का शब्द है—अर्थ है बहुत अधिक, प्रचुर, विपुल। इसलिए ‘भूरि-भूरि प्रशंसा’ का सीधा-सादा अर्थ है—बहुत अधिक प्रशंसा। वैदिक संस्कृत से लेकर हिंदी के श्रेष्ठ साहित्य तक भूरि का भूरि-भूरि प्रयोग मिलता है। अब ज़रा आधुनिक भाषा का कमाल देखिए। बोलने में सुविधा, यानी मुख-सुख और प्रयत्नलाघव के फेर में छोटी ‘इ’ को थोड़ा खींच दिया गया और वह बड़ी ‘ई’ बन गई। बस, फिर क्या था—‘भूरि’ की मात्रा बदलते ही उसका अर्थ भी बदल गया। विपुल प्रशंसा पहुँच गई रंगशाला में और बन गई ‘भूरी-भूरी’! प्रशंसा तो एक भाव है और भाव का कोई रूप-रंग नहीं होता। भाषाविज्ञान की भाषा में यह श्रुतिसमभिन्नार्थक शब्दों के अनजाने और दोषपूर्ण प्रयोग का एक रोचक उदाहरण है। कहने वाला करना चाहता है—‘आपकी ढेर सारी प्रशंसा’, मगर एक मात्रा की फिसलन से ऐसा लगता है मानो वह कह रहा हो—‘आपकी प्रशंसा का रंग भूरा है!’ यानी एक छोटी-सी मात्रा ने अर्थ का पूरा मेकओवर कर दिया—‘प्रचुर’ से...

अतिशोधन और अर्धकुमारी

भाषाविज्ञान में, अतिशोधन (हाइपरकरेक्शन) एक ऐसी त्रुटि है, जिससे कोई वक्ता या लेखक, किसी रूप को सही या अधिक प्रतिष्ठित भाषा के रूप में समझते हैं और उसे प्रतिस्थापित करते हैं। कथित शुद्ध रूप का उपयोग करने के प्रयास में, किसी नियम को अधिक होशियारी से किंतु गलत तरीके से लागू करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक गलत रूप चल पड़ता है ।  भाषिक अतिशोधन के दो प्रमुख कारण हैं– अति सतर्कता और उस नियम विशेष का अज्ञान। अर्थात् एक वास्तविक या काल्पनिक वैयाकरणिक नियम को अनुपयुक्त संदर्भ में लागू किया जाता है, जिससे "सही" करने के प्रयास में गलत परिणाम सामने आते हैं।  अतिशोधन के उदाहरण सभी भाषाओं में मिल सकते हैं, हिंदी में भी।  शुभेच्छा के लिए 'शुभेक्षा', छात्र जीवन के लिए क्षात्र जीवन, क्योंकि अज्ञान-जन्य भ्रम से /क्ष/ और /छ/ को अभिन्न या परस्पर स्थानापन्न मान लिया जाता है। एक उदाहरण वैष्णोदेवी के यात्रा मार्ग में कटरा और भवन के बीच स्थित एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पड़ाव मिलता है, जो कभी-कभी समाचारों में भी दिखाई पड़ जाता है। नाम कुछ पुराना है– अधकुँवारी। किसी से भी उसका अर्थ पूछिए तो...

कुमाउँनी में ढेपुव, टाक और डबल

पुराने समय में कुमाउँनी भाषा में सिक्कों के लिए दो-तीन अलग-अलग शब्द व्यवहार में थे: ढेपुव, टाक और डबल/डबव।  एक पैसे के लिए 'डबल/डबव' और आधे पैसे के मूल्य वाले सिक्के के लिए 'ढेपुवा'। यह शब्द कंपनी राज का पैसा आने से पहले ही चलन में था। इसकी उत्पत्ति संस्कृत भाषा के ढेव्वुका (सिक्का, पैसा) से है। पहले एक पैसे के लिए प्रयुक्त डबल शब्द आज भी प्रचलित है। अर्थ विस्तार से अब यह एक पैसा ही नहीं, सामान्य मुद्रा या धन के लिए उपयोग में लाया जाता है। संयोग से तेलुगु भाषा का शब्द 'डब्बू', 'डब्बुलू' (सिक्का, धन) संस्कृत के 'ढेव्वुका' सिक्का से संबंधित है, और इस प्रकार यह हिंदी के 'ढबुआ' (एक प्राचीन तांबे का सिक्का) से भी जुड़ा हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि कुमाऊँ में भी डबल और ढेपू दोनों प्रचलित है और दोनों का मूल संस्कृत 'ढेव्वुका' माना जा सकता है। 'डबव' आज भी मुहावरों में इस्तेमाल होता है, जैसे: "मैं थें एक डबव न्हें" (मेरे पास एक भी पैसा नहीं है)। कहा जाता है कि 18-वीं सदी में, अंग्रेजी भाषा ने तेलुगु से 'डब' (मूल...

मसें, मूँछें और बाँछें

मस और मूँछ दोनों का मूल एक है– संस्कृत में श्मश्रु, प्राकृत में मस्सू।  किशोरावस्था में लड़कों में कुछ शारीरिक परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं। इनमें एक है नाक के नीचे ऊपरी होंठ पर उगती रोमावली - मसें। मसें भीगना एक मुहावरा है। लड़कों के जब मूँछों वाली पहली रोमावली आती है तो उसे मस कहते हैं। मसें भीगना मुहावरा है, अर्थ है युवावस्था की दहलीज़ पर होना। एक ओर श्मश्रु के प्राकृत रूप मस्सु से मस बना है, तो दूसरी ओर श्मश्रु से > मच्छु > मुच्छ > मूँछ। ♦️ इरफान साहब ने कभी X- मोहल्ले में पूछा था — "बाछें कहाँ हैं और वे कैसे खिलती होंगीं?" नाचीज़ ने कुछ यूँ अर्ज़ किया था: बाँछें हम सबके होती हैं। हमारे मुँह के दोनों सिरे (कोरें), जहाँ दोनों होंठ मिलते हैं, उन्हें बाँछें कहा जाता है। जब हम भीतर से प्रसन्न होते हैं तो वह प्रसन्नता मुस्कान के साथ बाँछों में व्यक्त होती है, और बाँछें खिलती हैं। हर मर्ज़ की दवा और हर शब्द की जड़ संस्कृत में ढूँढ़ने वाले कुछ लोग इसका मूल वांछा (इच्छा) से मानते हैं। 'हिंदी शब्द सागर' भी बाँछ को देशज शब्द मानता है और अर्थ देता है होठों की कोर! [नख...

सदृश, सदृश्य और सादृश्य

सदृश [विशेषण] जो देखने में किसी व्यक्ति, पदार्थ-जैसा हो (समान इव दृश्यतेऽसौ)। एक रूप-रंग का, समान, अनुरूप, तुल्य, बराबर, उपयुक्त। (like, resembling, similar to) सदृश्य (दृश्य सहित) कोई प्रचलित शब्द नहीं है– न हिंदी में, न संस्कृत में। सादृश्य (सदृशस्य भावः, संज्ञा) भिन्न है। अर्थ है- दो अलग-अलग वस्तुओं या अवधारणाओं के बीच तुलना में समानता या समरूपता का भाव (analogy)। मिलता-जुलतापन, संगति, बराबरी (likeness, resemblance, similarity). सादृश्यता उपयुक्त प्रयोग नहीं है, सादृश्य पर्याप्त है। सादृश्य पहले ही भाववाचक संज्ञा है। 'ता' प्रत्यय जोड़कर उसे दुबारा भाववाचक बनाने की आवश्यकता नहीं है। ♦️

अंतर्धान या अंतर्ध्यान

एक संदेह प्रायः दिखाई पड़ता है कि अचानक अदृश्य होना, ओझल होना के लिए अंतर्धान है या अंतर्ध्यान ? उत्तर है अंतर्धान, (अन्तर्+ √धा+ ल्युट्) दृष्टिगोचर न होना, छिप जाना, लोप हो जाना, न दिखाई पड़ना; disappearance, invisibility।  अमरकोश में भी अंतर्धान का यही अर्थ है। "अन्तर्धानं तिरोधाने दृश्यपदार्थस्य दर्शनायोग्यस्थाने स्थितौ, मुन्यादीनां शरीरत्यागे च।" दिखाई देने वाली वस्तु अदृश्य स्थान पर हो जाए तो अंतर्धान होना कहलाता है। ऋषि-मुनियों के शरीर त्याग को भी अंतर्धान होना माना जाता है। रामायण में, अन्यत्र भी, न दिखाई पड़ने की स्थिति के लिए अंतर्धान शब्द ही मिलेगा। ध्यान (√ध्यै+ल्युट्) है किसी पदार्थ, भाव को मन में उपस्थित करने की क्रिया। इसलिए अंतर्ध्यान (अंतर्+ध्यान) भीतर की ओर उन्मुख ध्यान, inward meditation को कहा जाएगा। यही मानसिक अवधान (meditation) है।  अंतर्ध्यान कोई प्रचलित शब्द नहीं है। भ्रमवश अंतर्धान को ही अंतर्ध्यान लिखते/बोलते हैं। ♦️

आरुषि

Arushi किसी नाम पर इन मंचों में प्रायः चर्चा होती है। मुझे भी लोग संदेश से पूछते हैं। मेरा सदा यह मानना है कि बच्चे का नामकरण उसके माता-पिता का परमाधिकार है, और अपना नाम नामधारी की निजी संपत्ति होती है।  आजकल देश में प्रायः सर्वत्र ही संस्कृत के नामों की ओर विशेष रुझान देखा जाता है, किंतु व्युत्पत्ति ज्ञात न होने, या भ्रामक व्युत्पत्ति से कभी-कभी अनाम भी संस्कृत नाम मान लिए जाते हैं।   इधर 'आरुषि' नाम बहुत चल रहा है, आज भी किसी ने पूछा है। दरअसल हिंदी-संस्कृत में "आरुषि" शब्द नहीं है। शब्द न होना कोई चिंता की बात नहीं है, जीवित भाषाओं में शब्द भंडार बढ़ता रहता है।  रुचि के अनुसार कुछ भी नाम रखा जा सकता है। व्याकरण शास्त्र भी कहता है कि नाम और ग्राम की व्यत्पत्ति नहीं देखी जाती। उनका होना ही सिद्ध होना है। अब आरुषि पर। संस्कृत में √रुष् हिंसायाम् धातु मारने, रूठने, क्रुद्ध होने (to kill, to destroy) के अर्थ में है। इससे आ उपसर्ग जोड़कर "आरुष्" बनता है, जिसका अर्थ है– बहुत क्रुद्ध (excessively furious) होना। पुराणों के अनुसार अरुषी/आरुषी (= क्रोधी) मनु की ए...

गधा (गर्दभ)

गधा संस्कृत में एक धातु है √गर्द (शोर करना, चीखना-चिल्लाना) उससे अभच् प्रत्यय जुड़कर बनता है गर्दभ। गर्दभ > गधा (गदहा)। एक सीधा-सादा पशु, donkey, ass. लाक्षणिक अर्थ: मूर्ख, भोला, simpleton, stupid. अविश्रामं वहेद्भारं शीतोष्णञ्च न विन्दति ससन्तोषस्तथा नित्यं त्रीणि शिक्षेत गर्दभात्॥ ~चाणक्य "बिना विश्राम किए भार वहन करना, सर्दी-गर्मी की चिंता न करना, सदा संतुष्ट रहना, ये तीन बातें गधे से सीखनी चाहिए।" गधे अनुशासित होते हैं और अपने काम को लेकर बहुत सजग रहते हैं। गधों की याददाश्त बहुत अच्छी होती है, वे रास्तों को आसानी से याद रख सकते हैं। कहते हैं कि रेखागणित का एक प्रमेय गर्दभानंद ने सिद्ध किया था — त्रिभुज की दो भुजाओं से तीसरी छोटी होती है। [चित्र कच्छी गधा (गुजरात), सौजन्य @विकी कॉमंस] गुजरात में दो विशिष्ट नस्लों के गधे मिलते हैं - हलारी गधा और कच्छी गधा। दोनों ही नस्लें गुजरात के पारंपरिक पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनके संरक्षण के लिए विशेष  उपाय किए जा रहे हैं। 🫏🫏🫏

सशक्तीकरण, तुष्टीकरण और नामकरण

मीडिया में प्रायः प्रयुक्त हो रहे "सशक्तिकरण", "तुष्टिकरण" जैसे शब्दों की शुद्धता पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए जब मैंने कहा कि "सशक्तीकरण" और "तुष्टीकरण" ठीक हैं, तो कुछ शंकाएँ आईं, जिनका समाधान करने का प्रयास यहाँ किया जा रहा है। मूल प्रत्यय करण (कृ+ल्युट्) है। करण जुड़ने से पहले संस्कृत व्याकरण के अनुसार आधार शब्द के स्वर में वृद्धि होती है। यह नियम हिंदी व्याकरण से समझने में अड़चन पैदा करता है, विशेषकर जब प्रत्यय अकारांत शब्दों से जुड़ता है; जैसे– सशक्त (विशेषण ) से करण (ई-करण) –> सशक्तीकरण को सीधे शक्ति से जोड़कर सशक्तिकरण किया जाता है। व्यक्तिकरण और तुष्टिकरण भी इसी का परिणाम हैं। विलीनीकरण, उदारीकरण, वैश्वीकरण, तुष्टीकरण आदि शब्दों को आप केवल '-करण' जोड़कर उन्हें नहीं समझा सकते जिनकी संस्कृत में पैठ नहीं है। सच यह है कि हिंदी शब्द निर्माण में अनेक बार संस्कृत व्याकरण सहायक नहीं होता। यह स्वाभाविक है क्योंकि हिंदी ने अपनी प्रवृत्ति के अनुसार प्रयोग किए हैं। संस्कृत व्याकरण में ई-करण बनने की प्रक्रिया है- कृ+ल्यप्> करण। जो जैसा न...

उत्तराखंड के कुछ तीर्थ नाम जो व्याकरण सिद्ध नहीं, लोक सिद्ध हैं

भाषा के मामले में एक सिद्धांत यह भी है कि जो लोक मान ले, वही शुद्ध। लोकमान्यता का अर्थ यह नहीं है कि मैं आज एक शब्द बना लूँ और कल लोग उसे मानने लगें। लोकमान्यता में सैकड़ों वर्ष लग सकते हैं। व्युत्पत्ति या व्याकरण की दृष्टि से उत्तराखंड के ये पवित्र तीर्थ-नाम अशुद्ध हैं, लेकिन अब लोक स्वीकृत हैं– गंगोत्री/गंगोत्तरी – इनका न तो उत्तर-दक्षिण से कुछ लेना-देना है, न उत्तरीय वस्त्र से। पौराणिक कथा के अनुसार गंगा (भागीरथी) का शिव की जटाओं से भूमि पर उतरना है "गंगावतरण।" जिस स्थान पर गंगा का अवतरण हुआ वह गंगावतरणी। गंगावतरणी से> गंगावतरी> गंगोत्तरी> गंगोत्री। लोक ने अवतरी को "उतरी"  मानकर पुनः संधि पद बना दिया – गंगा + उतरी= गंगोतरी। व्याकरण में यह संधि संभव नहीं, लोक का अपना तर्क होता है।   यमुनोत्री/यमुनोत्तरी को सीधे ही गंगोत्री/गंगोत्तरी के अनुकरण पर बना लिया गया है और उसी की भाँति सौ टका शुद्ध माना जाता है। बद्रीनाथ – बदर, बदरी बेर के फल को कहा जाता है। एक पुराण कथा के अनुसार भगवान विष्णु यहाँ बदरी वन, बद्रिकाश्रम में तपस्या में लीन थे तो उन्हें हिमपात ...

कढ़ी

कढ़ी एक लोकप्रिय और पारंपरिक भारतीय व्यंजन है, जिसे मुख्य रूप से बेसन, दही या छाछ और विभिन्न मसालों के साथ पकाकर तैयार किया जाता है। कढ़ी पकाने की विधि सरल होने और इसके तीखे और चटपटे स्वाद के कारण यह बहुत लोकप्रिय व्यंजन है। (फोटो साभार: विकीपीडिया) कढ़ी की व्युत्पत्ति बड़ी रोचक है। इसका संबंध वैद्यक वाले काढ़े से है। संस्कृत में √क्वथ् धातु का अर्थ है उबालकर गाढ़ा करना। क्वथ् से ही बनता है 'क्वाथ' (काढ़ा, डिकॉक्शन)। क्वथ् से क्त प्रत्यय जोड़कर कृदंत विशेषण क्वथित– (उबालकर गाढ़ा किया हुआ)। संस्कृत क्वथित > प्राकृत कढित> कढ़िय> हिंदी कढ़ी। नेपाली और कुमाउँनी में ढ़ को ड़ बोलने से 'कड़ी'। कुमाऊँ में कहीं-कहीं 'कढ़ी' ('कड़ी') को ग्राम्य अपशब्द (टैबू) माना जाता है, इसलिए इसे वैकल्पिक नाम दिए गए हैं – झोली (झोई) और पयो! झोली, झोल (अर्थात् रस, तरी, ग्रेवी) से है और पयो संस्कृत पय से (√पीङ्, पीयते यत्, जिसे पिया जाए)। हिंदी में प्रचलित कढ़ी से जुड़े कुछ प्रमुख मुहावरे और उनके अर्थ नीचे दिए गए हैं: * कढ़ी का सा उबाल: इसका अर्थ है ऐसा जोश, क्...

कड़ाही, कढ़ाई और कड़ाई

शब्द विवेक #साधो_शब्दविचारो  कड़ाही, कड़ाई, कढ़ाई 🧿 कड़ाही – सं कटाह> प्रा कडाह > हिं कड़ाह> स्त्रीलिंग कड़ाही। *लोहे की कड़ाही। *जलेबी की कड़ाही। 🧿 कढ़ाई– काढ़ना क्रिया का भाव —> कढ़ाई।  कपड़े पर सुई-धागे से की जाने वाली सजावटी सिलाई। * लखनऊ का 'चिकन वर्क' एक प्रकार की कढ़ाई है। मूल शब्द न जानने के कारण 'कड़ाही' को भी 'कढ़ाई' कहा जाने लगा है। जैसे–कढ़ाई पनीर (पनीर के टुकड़ों पर कढ़ाई का डिज़ाइन ज़रूर देखिएगा!) 🧿कड़ाई – सं कड्ड (कठोर, कर्कश) से हिंदी विशेषण कड़ा, कड़ा होने का भाव कड़ाई। * कड़ाई से पेश आना।

सन्यास, संन्यास या सन्न्यास

सांसारिक मोह-माया का, कर्तव्यों और आग्रहों का पूर्ण परित्याग करके स्वयं को ईश्वर या उच्च उद्देश्य के प्रति समर्पित करने की स्थिति को इन तीन शब्दों में से क्या कहा जाए, यह प्रश्न है। (फोटो साभार X, पूर्व ट्विटर से) संलग्न चित्र में विशेषज्ञ वक्ता का निर्णय स्पष्ट है। कार्यक्रम का नाम "ज़िद" (हठ) सर्वथा उपयुक्त है। इस बात का हठ कि जो हम कहें वही ठीक। भाषा के अपने नियम होते हैं, वहाँ ज़िद नहीं चलती। "संन्यास" ठीक है, और "सन्न्यास" भी। हिंदी में संन्यास अधिक प्रचलित है। कैसे? आइए, जानें। संस्कृत व्याकरण में एक सूत्र है "मोऽनुस्वारः", यह म् के बाद व्यंजन होने पर म् को अनुस्वार करता है । इस सूत्र से सम्+न्यास को 'संन्यास' हुआ। अब सं+न्यास को "अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः" (अनुस्वार को वर्गीय व्यञ्जन परे होने पर परसवर्ण अर्थात बाद वाले वर्ण का पंचमाक्षर) सूत्र से परसवर्ण हुआ तो सन्न्यास हुआ। अब "वा पदान्तस्य" (पदान्त के अनुस्वार को वर्गीय व्यञ्जन परे होने पर विकल्प से परसवर्ण होता है)। इस सूत्र से परसवर्ण विकल्प से हो...

'क्याप' और 'कसप' की अर्थ छबियाँ

मनोहर श्याम जोशी के दो प्रसिद्ध उपन्यास हैं – 'क्याप' और 'कसप'। दोनों उपन्यासों की हिंदी को 'कुमाउँनी हिंदी' कहा जा सकता है क्योंकि उपन्यासों में अनेक कुमाउँनी शब्दों का प्रयोग हुआ है और वाक्य रचना की शैली भी कुमाउँनी से अत्प्रयधिक भावित है। दोनों उपन्यासों के नाम अपने आप में रहस्य हैं और पाठक को उनका अर्थ धीरे-धीरे स्पष्ट होता है। आइए, दोनों पर क्रमशः संक्षेप में विचार करें। क्याप "आप कहेंगे कि यह कथा तो क्याप-जैसी हुई ! धैर्य-धन्य पाठको, यही तो रोना है।"  ~मनोहर श्याम जोशी क्याप दो घटकों से निर्मित होता है– /क्या/ सर्वनाम (यहाँ अनिश्चयवाचक) और निपात /प/। क्याप का हिंदी में कोई समानार्थी शब्द नहीं, और कुमाईं में इसकी अनेक अर्थ छबियाँ हैं! उन्हें कुमाउँनी के संदर्भ में समझना ही उपयोगी होगा।  कुछ प्रयोग किस प्रकार हैं – * क्याप भै = अजीब, अनगढ़, निराशाजनक, बेकार * क्याप है गो != जाने क्या हो गया * क्याप छु हात में = कुछ अनजाना है... *भोव क्याप हो = भविष्य अनिश्चित है * हमरि क्याप = हमारी बला से * क्याप चितुणयूँ = अजीब-सी बेचैनी  * क्याप है पड़...

हास्यास्पद लिंग निर्धारण

बराबरी की हास्यास्पद पहल  हिंदी के साथ आपराधिक छेड़छाड़ करने में नवभारत टाइम्स नाम का यह प्रमुख राष्ट्रीय पत्र सबसे आगे रहा है। इन्हें कोई बताए कि हिंदी में पदवाची नाम लिंग निरपेक्ष होते हैं।  किसी भी भाषा का एक सतत प्रवाह होता है। वह अचानक उत्पन्न नहीं होती। उसका इतिहास होता है और भविष्य भी। यह बात और है कि भाषा का भविष्य उसे वर्तमान में  बरतने वालों के हाथ में होता है। वे चाहें तो अपनी भाषा का बेड़ा ग़र्क भी कर सकते हैं और चाहे तो उसे डूबने से बचा भी सकते हैं।  "दुनिया में पहली बार बराबरी की भाषा" का आविष्कार करने का दावा करने वाले नभाटा के इन भाषा विशेषज्ञों से पूछा जाए कि प्रत्येक संज्ञा और विशेषण शब्द का स्त्री लिंग बनाने की पहल करने की भाषिक आवश्यकता क्या है? कौन यह परामर्श दे रहा है और यह सत्प्रयत्न स्वयं हिंदी भाषा के प्रति और उसके वरतने वालों के प्रति कितना न्याय संगत है। बल्लेबाज का स्त्रीलिंग 'बल्लेबाजनी', वैज्ञानिक का 'वैज्ञानिका' और सबसे हास्यास्पद प्रयास विधायक के लिए 'विधायिका'! जबकि विधायिका हिंदी में लेजिस्लेचर के लिए स्वीकृत और बहुप्र...

अनड्वान

अनड्वान  कुमाऊँ में अर्थ की दृष्टि से निगरगंड वर्ग का ही एक अन्य शब्द प्रचलित है– अनड्वान्। यह हिंदी में कम प्रचलित है, यद्यपि कुछ शब्दकोशों नेे इसका या इसकेे मूल प्रातिपदिक अनडुह् का उल्लेख किया है। अनड्वान शब्द की यात्रा बड़ी रोचक है। इसकी उत्पत्ति अनडुह् शब्द से है और जिसका शाब्दिक अर्थ है– अन (रथ, गाड़ी) को हाँकने वाला अनडुह्। 'अनडुह्' प्रातिपदिक का प्रथमा, एकवचन– अनड्वान् ।  इस प्रकार अनड्वान का पहला ही अर्थ हो गया बैल, और लक्षणा से गृहस्थी के रथ को हाँकने वाला अर्थात् परिवार का मुखिया। काल के रथ को निरंतर चलाने वाला हमारे सौर जगत का वह सबसे बड़ा और ज्वलंत तारा जिससे सब ग्रहों को ऊष्मा और प्रकाश मिलते हैं, अर्थात् सूर्य को भी अनड्वान कहा जाता है। बृहस्पति का भी एक नाम अनड्वान है। वेदों में अनड्वान् के  अनेक उल्लेख हैं । अनड्वान् अनेक मंत्रों के दृष्टा ऋषि हैं। अथर्ववेद में एक पूरे सूक्त को अनड्वान सूक्त कहा जाता है। "अनड्वानिन्द्रः स पशुभ्यो वि चष्टे त्रयां छक्रो वि मिमीते अध्वनः।  भूतं भविष्यद्भुवना दुहानः सर्वा देवानां चरति व्रतानि ॥" (अथर्ववेद– 4.11.2) यह म...

आकलन या आँकलन

अनेक सिद्ध लेखक, प्रसिद्ध  संपादक, अनुभवी अनुवादक शब्दों की व्युत्पत्ति संबंधी अज्ञान या अधूरे ज्ञान के कारण आकलन को आँकलन लिखते पाए जाते हैं। सामान्य जन भी गीता में भगवान कृष्ण के वचनों को ध्यान में रखते हुए उन्हें ही श्रेष्ठ आदर्श मानकर अनुकरण करते हैं और शब्दों की ऐसी वर्तनी चल पड़ती है जो भाषा में सही नहीं है।  आकलन (estimation, assessment), कलन (calculation) से आ उपसर्ग लगाकर व्युत्पन्न होता है। मूल संस्कृत शब्द कलन (√कल्+ल्युट्) 'जानना, समझना, बोध पाना' से ही काल शब्द बना है। आकलन करना संपूर्ण जाँच-परख करना। 'आँकलन' कोई शब्द नहीं है। कुछ लोग अंक (digit, number) से आँक और आँक से आँकलन, ऐसी व्युत्पत्ति करते हैं, जो भ्रामक है। अंकन तत्सम से आँकना बनेगा, बीच में //ल// कैसे आ जाएगा! समस्या तो आँकलन की है, आँकना की नहीं। असल में कुछ क्षेत्रों में शुद्ध स्वरों को अनुनासिक बनाकर उच्चारण किया जाता है अर्थात नाक से बोला जाता है; जैसे– डाकिया> डाँकिया, पान> पाँन। संभवत: इसीलिए आकलन को भी आँकलन कह दिया जाता है और भ्रमवश उसे शुद्ध मान लिया जाता है। कुल मिलाकर आँकलन भ्राम...

खेत की बात क्षेत्र से… …!

 सिख धर्म के तीसरे गुरु, गुरु श्री अमरदास जी का प्रसिद्ध कथन है– "सूरा सो पहचानिए, जो लरै दीन के हेत, न पुरजा-पुरजा कट मरै, कबहुँ न छाँड़ै खेत॥"  खेत संस्कृत के क्षेत्र से बना है और बहु-अर्थी शब्द है। संस्कृत में क्षेत्र का अर्थ खेत, भूमि, बाड़ा या मैदान के अतिरिक्त देह , विस्तार, पत्नी आदि भी है। अनेक तीर्थस्थानों को भी क्षेत्र कहा गया है।  हिंदी में सामान्यतः हम उस भूमिखंड को खेत कहते हैं जो जोतने-बोने और अन्न, शाक-सब्ज़ी आदि की फसल उगाने के योग्य हो। प्रदेश, इलाका, भूभाग या मंडल भी क्षेत्र कहलाता है। किसी देश या दुनिया का एक विशेष हिस्सा भी क्षेत्र है, जो अपनी भौगोलिक, प्राकृतिक या सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण अन्य क्षेत्रों से अलग पहचाना जाता है। विशेषता के अनुसार ही आकार में यह छोटा भी हो सकता है (जैसे- हिंदी भाषी क्षेत्र) और विस्तृत भी (जैसे- यूरोपीय क्षेत्र)। पुराने ज़माने में लड़ाइयाँ विशाल मैदान में आमने-सामने हुआ करती थीं, इसलिए युद्धक्षेत्र, रणक्षेत्र, लड़ाई के मैदान को भी खेत कहा गया। हतौं न खेत खेलाइ खेलाई ।  तोहि अबहि का करौं बड़ाई । —मानस, ६ । ३४ ।...

दुहाई है

दुहाई [द्वि–> दो–> दु, + आह्वान (बुलाना, टेरना) –> हाई = दुहाई]। अथवा [दु (दो)> दुह (जैसे दुहाजू में) + आई प्रत्यय, (जैसे- इकाई, दहाई, तिहाई, चौथाई में)] प्रयोग के अनुसार अर्थ है– दो बार पुकारना, घोषणा करना, जैसे– बचाओ-बचाओ, रक्षा करो - रक्षा करो, जय हो-जय हो की दुहरी पुकार। घोषणा होना, डंका पीटना, मुनादी करना भी दुहाई का अर्थ है। बैठे राम राजसिंहासन जग में फिरी दुहाई ।   संकट या आपत्ति आने पर रक्षा के लिये पुकारना; जैसे बचाओ, बचाओ! त्राहि माम्, त्राहि माम्। अपने बचाव के लिये किसी का नाम लेकर पुकारना।  दुहाई एक प्रकार से दया/न्याय की अपील भी है। दुहाई का एक अर्थ शपथ या सौगंद भी है। राम दुहाई (राम की कसम)। नाथ सपथ पितु चरन दुहाई । भयउ न भुवन भरत सम भाई॥ —तुलसी दुहना क्रिया से भाववाचक संज्ञा भी बनती है दुहाई, अर्थात् दुहने का भाव, दोहन। ♦️