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दाँत और दाढ़

मेंरे दाँत में जब दर्द हुआ तो मित्र ने परामर्श दिया, दाढ़ उखड़वा लो | अब यह समझ के परे की बात है कि दर्द तो दाँत में हो और आप दाढ़ उखड़वा लें। वस्तुतः तो जो दाँत हैं वे दाढ़ नहीं हैं, और जो दाढ़ हैं वे दाँत हैं भी और नहीं भी| दाँत संस्कृत दन्त से व्युत्पन्न है जब कि दाढ़ दंष्ट्र से (संस्कृत दंष्ट्र/दंष्ट्रा > प्राकृत दड्ढ/दड्डा > हिंदी दाढ़/दाड़)। हमारे मुँह के भीतर जीभ के चारों ओर ऊपर और नीचे के जबड़े से लगे जो औजार काटने, चबाने के लिए प्रकृति ने दिए हैं, वे सब दाँत की परिभाषा में आ जाते हैं किंतु उनमें स्थान भेद से नाम भेद भी है | सामान्यत: सामने की ओर के चार दाँत कर्तक कहलाते हैं। सौंदर्य वृद्धि में सहायक होते हैं और असल दाँत भी यही हैं | मुखड़े की सुंदरता बहुत कुछ दंत या दाँत पंक्ति पर निर्भर रहती है। मुँह खोलते ही 'वरदंत की पंगति कुंद कली' सी खिल जाती है, मानो 'दामिनि दमक गई हो' । उनके बाद "कुत्ते वाले" दाँतों (canine teeth) को कुछ लोग कुकुर दाढ़ कहते हैं , पर असल में दाढ़ शब्द सबसे अंत के 2 + 2 दाँतों के लिए है , जिन्हें चौभर भी कहा जाता है| इन्हीं में से एक और महत्त्वपूर्ण है जिसे अक्ल दाढ़ कहा जाता है; अर्थात इस दाँत के निकलने पर ही आदमी अक्लमंद माना जाता है । कभी-कभी निकलने में अकल दाढ़ इतना कष्ट देते हैं के दंत चिकित्सक उन्हें निकलवा लेने का ही सुझाव दिया करते हैं और इस तरह आप अकल दाढ़ के प्रमाण पत्र के बिना अकलमंद बनते बनते रह जाते हैं | कहा तो यह भी जाता है कि शादी के बाद सबको अक्ल आ जाती है, यदि न आए तो उसके अकल दाढ़ को देखा जाना चाहिए। 
पशु हो या मनुष्य, दाँत अनेक जीव धारियों के महत्त्वपूर्ण औज़ार हैं, पर यह भी सच नहीं है कि दाँत केवल जीवधारियों के ही होते हैं। अनेक काटने, कुतरने वाली निर्जीव वस्तुओं के भी दाँत होते हैं जैसे आरी, चाकू, कंघी, दराती (दाँती)। इनके दाँत न हों तो ये किसी काम के नहीं हैं। फिर आप या तो उन्हें तेज़ करते हैं या नया उपकरण खरीद लेते हैं। दाँत को संस्कृत में द्विज अर्थात दो बार जन्म लेने वाला भी कहा गया है। मनुष्य सौभाग्यशाली है कि उसके दूध के दाँत निकलने के बाद एक बार फिर प्रकृति उसे सशक्त दाँत देती है। अब यह बात और है कि बुढ़ापे में एक- एक कर पूरी बत्तीसी बदलनी पड़े। तब उन्हें द्विज के बदले त्रिज कहना अधिक उपयुक्त होगा, पर कोई कहता नहीं ।
दाँत से बने मुहावरे बड़े रोचक है। आप दाँत दिखाते हैं, खीस निपोरते हैं, किसी के दाँत खट्टे करने में आपकी रुचि न भी हो तो भी बहुत संभव है किसी से उलझ पड़े तो वह आपके दाँत खट्टे कर दे। जाड़े की महिमा यह है कि आपके दाँत किटकिटाते रहते हैं। किसी के दाँत दिखाने के और होते हैं, खाने के और। और तो और विष्णु के एक अवतार ने इस धरती को अपने दो दाँतो में उठाया हुआ है।

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