अनड्वान
कुमाऊँ में अर्थ की दृष्टि से निगरगंड वर्ग का ही एक अन्य शब्द प्रचलित है– अनड्वान्। यह हिंदी में कम प्रचलित है, यद्यपि कुछ शब्दकोशों नेे इसका या इसकेे मूल प्रातिपदिक अनडुह् का उल्लेख किया है।
अनड्वान शब्द की यात्रा बड़ी रोचक है। इसकी उत्पत्ति अनडुह् शब्द से है और जिसका शाब्दिक अर्थ है– अन (रथ, गाड़ी) को हाँकने वाला अनडुह्। 'अनडुह्' प्रातिपदिक का प्रथमा, एकवचन– अनड्वान् ।
इस प्रकार अनड्वान का पहला ही अर्थ हो गया बैल, और लक्षणा से गृहस्थी के रथ को हाँकने वाला अर्थात् परिवार का मुखिया। काल के रथ को निरंतर चलाने वाला हमारे सौर जगत का वह सबसे बड़ा और ज्वलंत तारा जिससे सब ग्रहों को ऊष्मा और प्रकाश मिलते हैं, अर्थात् सूर्य को भी अनड्वान कहा जाता है। बृहस्पति का भी एक नाम अनड्वान है।
वेदों में अनड्वान् के अनेक उल्लेख हैं । अनड्वान् अनेक मंत्रों के दृष्टा ऋषि हैं। अथर्ववेद में एक पूरे सूक्त को अनड्वान सूक्त कहा जाता है।
"अनड्वानिन्द्रः स पशुभ्यो वि चष्टे त्रयां छक्रो वि मिमीते अध्वनः।
भूतं भविष्यद्भुवना दुहानः सर्वा देवानां चरति व्रतानि ॥"
(अथर्ववेद– 4.11.2)
यह मंत्र अथर्ववेद के अनड्वान सूक्त से है, जिसमें 'अनड्वान्' (बैल) की महिमा का वर्णन करते हुए उसे इंद्र के समान सर्वशक्तिमान् और जगत का पालनहार बताया गया है।
हिंदी तथा लोक भाषाओं तक आते-आते अनड्वान के शाब्दिक या प्रतीकार्थ को तो भुला ही दिया गया। मूल अर्थ बैल को ध्यान में रखते हुए इसका अर्थ विस्तार हो गया। चूँकि बैल को मूर्खता का प्रतीक माना गया है, इसलिए बज्र मूर्ख, जड़ बुद्धि मनुष्य को भी अनड्वान कहा जाता है।
कुमाउँनी में भी अनड्वान मूल स्वरूप में वैदिक संस्कृत से रत्ती भर भी घिसे-पिटे बिना ज्यों-का-त्यों पहुँचा है, किंतु अर्थ में बदलाव आया है। अब अनड्वान उसे कहा जाता है जो सेहतमंद, किंतु महामूर्ख और निकम्मा हो। बताने, समझाने पर भी न बात समझे। पूरा निगरगंड हो।
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