बराबरी की हास्यास्पद पहल
हिंदी के साथ आपराधिक छेड़छाड़ करने में नवभारत टाइम्स नाम का यह प्रमुख राष्ट्रीय पत्र सबसे आगे रहा है। इन्हें कोई बताए कि हिंदी में पदवाची नाम लिंग निरपेक्ष होते हैं।
किसी भी भाषा का एक सतत प्रवाह होता है। वह अचानक उत्पन्न नहीं होती। उसका इतिहास होता है और भविष्य भी। यह बात और है कि भाषा का भविष्य उसे वर्तमान में बरतने वालों के हाथ में होता है। वे चाहें तो अपनी भाषा का बेड़ा ग़र्क भी कर सकते हैं और चाहे तो उसे डूबने से बचा भी सकते हैं।
"दुनिया में पहली बार बराबरी की भाषा" का आविष्कार करने का दावा करने वाले नभाटा के इन भाषा विशेषज्ञों से पूछा जाए कि प्रत्येक संज्ञा और विशेषण शब्द का स्त्री लिंग बनाने की पहल करने की भाषिक आवश्यकता क्या है? कौन यह परामर्श दे रहा है और यह सत्प्रयत्न स्वयं हिंदी भाषा के प्रति और उसके वरतने वालों के प्रति कितना न्याय संगत है। बल्लेबाज का स्त्रीलिंग 'बल्लेबाजनी', वैज्ञानिक का 'वैज्ञानिका' और सबसे हास्यास्पद प्रयास विधायक के लिए 'विधायिका'! जबकि विधायिका हिंदी में लेजिस्लेचर के लिए स्वीकृत और बहुप्रयुक्त है।
हिंदी भाषा को बराबरी का दर्जा देने के लिए व्यग्र इन उत्साही युवकों से कोई पूछे कि इस प्रकार क्या राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सचिव, न्यायमूर्ति, आयुक्त, लेखाकार, जिलाधीश और ऐसे ही सैकड़ों शब्दों को बराबरी का दर्ज़ा दे पाएँगे?
दुनिया भर में लिंग संवेदनशीलता का सिद्धांत अपनाया जा रहा है, और भाषाओं में भी इसी के अनुरूप शब्दों को ग्रहण करने की बात की जाती है। अंग्रेजी में बैट्समैन शब्द को पुरुष प्रधान मानकर उसे बैटर कर दिया गया है और आपको उसे बल्लेबाज़नी करना है।
इन पदों पर विद्यमान महिलाओं से भी पूछ कर देखिए क्या उन्हें बराबरी के नाम पर ऐसे शब्द पसंद हैं? अपने आप से भी पूछिए कि आप हिंदी का भला कर रहे हैं या हिंदी और हिंदी पत्रकारिता दोनों की हँसी उड़ा रहे हैं?
राजनीति की भाषा बोलने वाले आजकल यों ही हिंदी के विरोध में कुछ भी बोल जाते हैं और हिंदी का कथित श्रेष्ठ राष्ट्रीय दैनिक हिंदी का हास्यास्पद 'निर्माण' कर रहा है!
सभी लेखकों, पत्रकारों और हिंदी बरतने वाले देशवासियों को इस बारे में सोचना चाहिए।
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