नाक नाम की गजब चीज़ दी है भगवान ने। कुछ ऐसा-वैसा हो जाए तो नाक कट जाती है। अच्छा काम कोई कर दे तो हम कहते हैं हमारी नाक रख दी। यद्यपि रखी-वखी कहीं नहीं जाती, जहाँ भगवान ने रखी है वहीं रहती है लेकिन मुहावरा तो है नाक रख ली। कुछ ऐसे बेशर्मों की भी नाक कटती है जिनके बारे में कहते हैं, नाक कटी तो गज भर और बढ़ी।
कुछ लोग बड़ी नाक वाले होते हैं। यों उनकी नाक देखने में बड़ी नहीं होती; चपटी, बेडौल या बदसूरत भी हो सकती है लेकिन बस, नाक के नखरे ऐसे कि कहना पड़ता है, साहब! बड़ी नाक वाले यूं ही थोड़े मानेंगे।
चुनाव के मौसम में बड़े-बड़े बड़ी नाक वाले नेता मतदाता के पैरों पर नाक रगड़ते देखे जाते हैं। कुछ लोग उनकी नाक का बाल बने खटकते हैं और कुछ उनकी नाक पकड़ने-रगड़ने को तैयार बैठे होते हैं। मुसीबत वहाँ हो जाती है जहाँ कोई मुद्दा नाक का बाल हो जाता है। नाक के बाल की चुभन से बचने के लिए या तो उसे उखाड़ डालिए या विरोधी की नाक में नकेल डालने का मौका तलाशिए।
बहरहाल हमने लोकतंत्र की नाक रखने की कोशिश की है, इस उम्मीद के साथ कि यही संविधान रहा तो आगे भी चुनाव होते रहेंगे।
आमीन।
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